ऐसा कहा जा रहा था कि दुनिया अब बहुध्रुविय हो रही है। अमेरिका का एकछत्र राज समाप्त हो गया। पावर सेंटर बदल रहा है। लेकिन दिखाई केवल अमेरिका देता है। हुक्म केवल ट्रंप का चलता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो पहले अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कम से कम “लोकतंत्र” जैसे शब्दों का उपयोग किया जाता था, लेकिन अब खुलकर बुलियन जैसा व्यवहार दिखाई दे रहा है। इसे कूटनीतिक भाषा में फिर से मोनरो सिद्धांत (Monroe Doctrine) के नाम से जोड़ा जा रहा है। यह वही पुराना सिद्धांत है जिसे अमेरिका ने 1823 में पश्चिमी गोलार्ध के देशों में बाहरी हस्तक्षेप को रोकने के लिए अपनाया था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के कई देशों ने“शक्ति ही अधिकार नहीं है वाली राजनीति से बाहर निकलने की कोशिश की थी। यूएसएसआर के पतन के बाद तो बहुध्रुवीय विश्व की बातें भी हुईं। लेकिन यह सब तब तक चलता रहा जब तक एक प्रमुख शक्ति अमेरिका को यह मंज़ूर था। अमेरिका ने फिर से यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि वह चाहे तो समस्त नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को तार-तार कर सकता है। उसने स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिमी गोलार्ध यानी उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका उसकी प्रभाव-क्षेत्र है, और वह अपने आस-पास किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेगा — चाहे वह रणनीतिक हो, राजनीतिक हो या आर्थिक। लेकिन सिर्फ अमेरिका ही महान शक्ति की राजनीति नहीं कर रहा है। दुनिया के दूसरे छोर पर, भारत के बेहद करीब बैठा चीन भी उसी “ग्रेट पॉवर पॉलिटिक्स” के रास्ते पर चल रहा है। चीन ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र को लगभग अपना प्रभाव-क्षेत्र मान लिया है। वह यहां किसी दूसरी बड़ी ताकत को अपने बराबर या उससे मजबूत होते देखना नहीं चाहता। यही वजह है कि समय-समय पर उसका टकराव जापान, ताइवान और भारत जैसे देशों से होता रहता है। आज चीन भी अपने तरीके से एक नई “चीन सिद्धांत” गढ़ रहा है, ठीक वैसे ही जैसे दो सौ साल पहले अमेरिका ने मोनरो सिद्धांत बनाया था। इसी बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए पिछले दस वर्षों में अमेरिका ने QUAD जैसे समूहों के जरिए चीन को संतुलित करने की कोशिश की। लेकिन अब अमेरिकी राजनीति में आए बदलावों ने पूरी रणनीति को उलझा दिया है। अगर अमेरिका अपनी पारंपरिक संतुलन नीति से पीछे हटता है, तो चीन को एशिया में खुली छूट मिल सकती है। इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा और खासकर भारत जैसे देशों की सुरक्षा और रणनीतिक स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है। साल 1823 की बात है… उस समय अमेरिका अभी 50 साल से भी कम पहले स्वतंत्र हुआ था, और उसने अभी तक पश्चिम की ओर मार्च कर प्रशांत तट पर कब्ज़ा नहीं किया था। उस शुरुआती दौर में, वहां के नेताओं ने पहले ही “अमेरिकी प्रभाव-क्षेत्र” की बात करना शुरू कर दिया था। यह वही समय था जब अमेरिका की स्वतंत्रता से प्रेरित होकर कई दक्षिण और मध्य अमेरिका के उपनिवेश भी यूरोपीय शक्तियों से आज़ादी मांग रहे थे। ब्राज़ील और अर्जेंटीना जैसे देश भी स्वतंत्र हुए थे। ऐसे ही समय में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मोनरो ने एक घोषणा जारी की कि पश्चिमी गोलार्ध में यूरोपीय शक्तियों का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, यानी उत्तर और दक्षिण अमेरिका अमेरिका के प्रभाव-क्षेत्र के रूप में माना जाएगा। यह नीति बाद में मोनरो सिद्धांत के नाम से जानी जाने लगी। मोनरो सिद्धांत का मूल उद्देश्य यह था कि यूरोपीय शक्तियाँ अमेरिका के महाद्वीपों में उपनिवेश स्थापित या राजनीतिक रूप से हस्तक्षेप न करें। उस समय अमेरिकी सैन्य शक्ति इतनी मजबूत नहीं थी, इसलिए यह सिद्धांत शुरू में यूरोप पर ज़्यादा असर नहीं डाल पाया। परंतु समय के साथ यह अमेरिका की विदेशी नीति का एक प्रमुख स्तंभ बन गया और बाद के दशकों में कई अवसरों पर इसे लागू किया गया। अगले कुछ वर्षों में अमेरिका ने पश्चिम की ओर विस्तार किया और आखिरकार प्रशांत महासागर के तट तक पहुँच गया। अब पूरा महाद्वीप उसके नियंत्रण में था। विस्तार पूरा हो चुका था, अब बारी थी अपनी सीमाओं को सुरक्षित और मजबूत बनाने की। यहाँ अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत उसकी भौगोलिक स्थिति थी। एक ओर अटलांटिक महासागर और दूसरी ओर विशाल प्रशांत महासागर। इन दोनों के बीच स्थित अमेरिका एक प्राकृतिक किले जैसा बन गया। यही कारण है कि सीधे अमेरिका पर हमला करना लगभग असंभव माना जाता था। लेकिन अब सवाल था शक्ति का विस्तार कैसे किया जाए? चारों ओर समुद्र था, तो आगे बढ़ने का रास्ता क्या हो? अमेरिका ने देखा कि उस समय की बड़ी शक्तियाँ ब्रिटेन, स्पेन और नीदरलैंड अपनी विशाल और ताकतवर नौसेना के दम पर पूरी दुनिया में प्रभाव बनाए हुए थीं। समुद्र पर नियंत्रण का मतलब था वैश्विक व्यापार पर नियंत्रण, और व्यापार पर नियंत्रण का मतलब था असीमित शक्ति। यहीं से अमेरिका ने महाद्वीपीय शक्ति (Continental Power) से आगे बढ़कर समुद्री वैश्विक शक्ति बनने का सपना देखना शुरू किया। जैसे-जैसे अमेरिका की सैन्य ताकत बढ़ी, वैसे-वैसे उसे इस्तेमाल करने की इच्छा भी बढ़ने लगी। कुछ ही वर्षों में अमेरिका ने लैटिन अमेरिका में सक्रिय हस्तक्षेप शुरू कर दिया। 1898 में अमेरिका ने स्पेन के खिलाफ युद्ध लड़ा, जिसे इतिहास में स्पेनिश अमेरिका व़ॉर के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध के बाद क्यूबा को स्पेन से स्वतंत्रता मिली, लेकिन प्यूर्टो रिको अमेरिका के नियंत्रण में आ गया। रूजवेल्ट ने 1904 में मोनरो सिद्धांत को और आक्रामक रूप देते हुए कहा कि अगर पश्चिमी गोलार्ध के किसी देश में अस्थिरता होगी, तो अमेरिका वहाँ हस्तक्षेप करेगा। अब अमेरिका केवल यह नहीं कह रहा था कि यूरोप दूर रहे बल्कि वह खुद इस क्षेत्र का “रक्षक” और “नियंत्रक” बनना चाहता था। अमेरिका जानता है कि अब अमेरिका की तुलना में किसी दूसरी अर्थव्यवस्था या सैन्य शक्ति का स्तर उसकी बराबरी तक नहीं पहुंचा है। अमेरिका ने दुनिया भर में चीन को संतुलित करने की कोशिश की है। चाहे वह क्वाड जैसे सहयोगी समूह बनाकर हो, या खाड़ी और यूरोप में अपने निवारक उपायों को मजबूत करके। कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि अमेरिका की हालिया नीतियाँ — जिनके कुछ पहलुओं को “डोनरो डॉक्टरेन” जैसा नाम भी दिया गया है। वे चीन के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश का हिस्सा हैं। हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अकेली सैन्य कार्रवाई किसी व्यापक प्रभाव को पीछे नहीं धकेल सकती, और यह रणनीति अनिवार्य रूप से लंबी अवधि की नीतियों, आर्थिक सहयोग और कूटनीति से जुड़ी होनी चाहिए। इस सिद्धांत के अनुसार, अमेरिका को राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य रूप से किसी भी पश्चिमी गोलार्ध के क्षेत्र में अपनी शक्ति दिखाने का अधिकार है। इसमें ट्रंप कोरोलरी भी शामिल है, जो अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का हिस्सा है। इसके तहत पश्चिमी गोलार्ध को अमेरिका के प्रभाव का मुख्य क्षेत्र माना जाता है, बाहरी ताकतों को यहां प्रवेश से रोकने की बात कही जाती है और अमेरिकी सुरक्षा हितों के खतरे पर हस्तक्षेप को सही ठहराया जाता है। ट्रंप प्रशासन ने इसे चीन और रूस जैसे वैश्विक ताकतों के साथ प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया। अमेरिका ने वेनेजुएला, ग्रीनलैंड और पनामा नहर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में अपनी प्राथमिकता को इस डोक्ट्रिन के माध्यम से स्पष्ट किया।
Subscribe to Updates
Get the latest creative news from FooBar about art, design and business.
US Global Dominance |क्या है ट्रंप का अखंड अमेरिका प्लान |Teh Tak Chapter 4
स्वराज भारत न्यूज़ डेस्क एक समर्पित टीम है, जो सटीक, निष्पक्ष और समयबद्ध समाचारों के माध्यम से पाठकों को सशक्त बनाने में विश्वास रखती है। राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज, संस्कृति, विज्ञान और खेल से जुड़ी विश्वसनीय खबरों की प्रस्तुति के साथ, हम पत्रकारिता की उच्च नैतिकता और पाठकों के भरोसे को अपनी प्राथमिकता मानते हैं। हमारा उद्देश्य है - सच्चाई सामने लाना और समाज को जागरूक बनाना।
Related Posts
हमारे बारे में
भारत का प्रमुख हिंदी वेब न्यूज़ चैनल, जो 24 घंटे समाचार, समसामयिक घटनाओं, मनोरंजन और राजनीति की कवरेज करता है।
हमारा मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।
हमारा उद्देश्य है आपको हर पल ताज़ा खबरों, समसामयिक घटनाओं, मनोरंजन और राजनीति से अपडेट रखना।
अगर आपके पास कोई भी खबर, तस्वीर, वीडियो या संदेश है, तो हमें भेजें:
Email Us: swarajbharat.in@gmail.com, desk@swarajbharatnews.com
Contact/Whatsapp: +91 9911333143
Subscribe to Updates
Get the latest creative news from FooBar about art, design and business.

