बार-बार प्यास लगना Image Credit source: Getty Images
पानी पीने के बाद भी बार-बार प्यास लगना कोई सामान्य स्थिति नहीं मानी जाती. आमतौर पर पानी पीने से प्यास बुझ जानी चाहिए, लेकिन अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो यह शरीर में चल रहे अंदरूनी बदलावों का संकेत हो सकता है. कई बार यह सिर्फ मौसम, ज्यादा पसीना या थकान के कारण होता है, लेकिन लंबे समय तक ऐसी स्थिति बने रहना किसी बीमारी की ओर इशारा कर सकता है.
साथ ही, अगर बार-बार पेशाब आना, मुंह सूखना, कमजोरी या थकान महसूस होना जैसे लक्षण दिखें, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. समय पर कारण समझना जरूरी है, ताकि सही इलाज किया जा सके और आगे होने वाली परेशानियों से बचा जा सके. आइए इस बारे में डिटेल में जानते हैं.
बार-बार प्यास लगना किन बीमारियों का लक्षण हो सकता है?
आरएमएल हॉस्पिटल में मेडिसिन विभाग में डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ. सुभाष गिरि बताते हैं कि बार-बार प्यास लगना सबसे पहले डायबिटीज मेलिटस से जुड़ा हो सकता है. इस स्थिति में खून में ब्लड बढ़ने के कारण शरीर अधिक पानी बाहर निकालता है, जिससे प्यास लगती है. इसके अलावा डायबिटीज इन्सिपिडस में हॉर्मोन की कमी के कारण अत्यधिक प्यास और पेशाब आता है.
डिहाइड्रेशन भी एक बड़ा कारण है, जो उल्टी, दस्त या ज्यादा पसीना आने से हो सकता है. किडनी की बीमारी में शरीर पानी का संतुलन सही नहीं रख पाता, जिससे प्यास बढ़ती है. थायरॉइड से जुड़ी समस्याएं, कुछ दवाओं के साइड इफेक्ट और मानसिक तनाव या चिंता भी इस समस्या को बढ़ा सकते हैं.
कैसे करें बचाव?
बार-बार प्यास लगने से बचाव के लिए सबसे जरूरी है पर्याप्त मात्रा में पानी पीना. दिनभर थोड़े-थोड़े अंतराल पर पानी लेते रहें. ज्यादा मीठे, नमकीन और कैफीन वाले पेय से बचें, क्योंकि ये शरीर को और डिहाइड्रेट कर सकते हैं.
संतुलित डाइट लें और फलों व सब्जियों को डाइट में शामिल करें. अगर डायबिटीज या थायरॉइड की समस्या है, तो दवाएं नियमित रूप से लें और जांच करवाते रहें. ज्यादा गर्मी या मेहनत के दौरान शरीर को आराम दें. बिना डॉक्टर की सलाह के दवाओं का सेवन न करें, क्योंकि कुछ दवाएं प्यास बढ़ा सकती हैं.
डॉक्टर से कब मिलें?
अगर पानी पीने के बाद भी कई दिनों तक लगातार प्यास लगती रहे, तो डॉक्टर से मिलना जरूरी है. खासतौर पर जब इसके साथ बार-बार पेशाब आना, अचानक वजन कम होना, अत्यधिक थकान, चक्कर या मुंह का ज्यादा सूखना महसूस हो.
पहले से डायबिटीज, किडनी या हॉर्मोन से जुड़ी बीमारी होने पर भी इस लक्षण को हल्के में नहीं लेना चाहिए. बच्चों और बुजुर्गों में यह समस्या ज्यादा गंभीर हो सकती है. समय पर जांच और सही इलाज से बड़ी बीमारियों से बचाव संभव है.

