भारतीय ज्ञान परंपरा और गौरवशाली इतिहास से नई पीढ़ी को जोड़ने के उद्देश्य से उत्तराखंड की धामी सरकार ने एक अहम पहल की है। राज्य के विद्यालयों में पहले से लागू गीता पाठ, रामायण और महाभारत के अध्ययन, भोजन मंत्र के उच्चारण और वंदेमातरम के गायन जैसे निर्णयों के बाद अब विद्यार्थियों को देश और प्रदेश के प्रतापी हिंदू राजाओं की गौरवगाथाएं भी पढ़ाई जाएंगी। इस फैसले को शिक्षा व्यवस्था में सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मूल्यों को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, कक्षा छह से लेकर बारहवीं तक के विद्यार्थियों के लिए प्रत्येक शनिवार को समय सारिणी की अंतिम कक्षा में 30 मिनट का विशेष सत्र निर्धारित किया गया है। इस सत्र को शून्य कालांश के रूप में रखा गया है, ताकि अन्य विषयों की पढ़ाई प्रभावित न हो और विद्यार्थी अतिरिक्त रूप से अपने इतिहास और परंपरा के बारे में जान सकें।इस नई पहल के तहत विद्यार्थियों को उत्तराखंड के प्रमुख शासकों जैसे वसुदेव कत्यूरी, कनकपाल, अजयपाल, प्रद्युम्न शाह, सोम चंद और ज्ञानचंद के बारे में विस्तृत जानकारी दी जाएगी। इसके साथ ही देश के विभिन्न कालखंडों के महान शासकों की गाथाएं भी पढ़ाई जाएंगी। मौर्य वंश के सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य से लेकर कश्मीर के राजा हरि सिंह तक, लगभग 2300 वर्षों के इतिहास को समेटते हुए विद्यार्थियों को इन शासकों के जीवन, उनके संघर्ष और उपलब्धियों से परिचित कराया जाएगा।सरकार का मानना है कि वर्तमान इतिहास की पुस्तकों में इन प्रतापी शासकों के योगदान को सीमित रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसी कमी को दूर करने के लिए यह पहल शुरू की गई है, ताकि छात्र अपने इतिहास के उस पहलू को भी समझ सकें, जो अब तक अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा है।इस कार्यक्रम के अंतर्गत विद्यार्थियों को सिर्फ नाम और घटनाएं ही नहीं, बल्कि इन शासकों के प्रशासनिक कौशल, वीरता, नेतृत्व क्षमता, राष्ट्रप्रेम और लोककल्याणकारी कार्यों के बारे में भी बताया जाएगा। इससे छात्रों में नेतृत्व और जिम्मेदारी की भावना विकसित होने की उम्मीद है।शिक्षण सामग्री को प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर तैयार किया जाएगा और इसे सरल, रोचक तथा संवादात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह है कि छात्र न केवल जानकारी प्राप्त करें, बल्कि इतिहास के प्रति उनकी रुचि भी बढ़े और वे अपने अतीत पर गर्व महसूस कर सकें।पाठ को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए विद्यालयों में प्रश्नोत्तरी, प्रतियोगिताएं और अन्य गतिविधियों का भी आयोजन किया जाएगा। इन गतिविधियों के माध्यम से छात्रों की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी और उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को पुरस्कृत भी किया जाएगा।
माध्यमिक शिक्षा निदेशक डॉ. मुकुल कुमार सती के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य छात्रों में आत्मगौरव और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ावा देना है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस अतिरिक्त सत्र के कारण अन्य विषयों की पढ़ाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
रिपोर्ट – अभिनव गुप्ता
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Desk SBN : “स्कूलों में अब पढ़ाई जाएगी शौर्य और संस्कृति की गाथा, धामी सरकार का बड़ा फैसला”
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