‘साहित्य आजतक लखनऊ’ के मंच पर शनिवार का दिन क्राइम फिक्शन के नाम रहा, जब अपराध, माफिया और रोमांचक कहानियों की दुनिया से जुड़े तीन चर्चित लेखक एक साथ जुटे। चर्चा का विषय था — ‘अपराध, माफिया और कहानियां’। मंच पर मौजूद थे ‘कोड काकोरी’ और ‘कसारी मसारी’ जैसी चर्चित किताबों के लेखक मनोज राजन त्रिपाठी, ‘बवाली कनपुरिया’ के लेखक संजीव मिश्रा, और अभिनेता मनोज बाजपेयी की जीवनी के साथ उपन्यास ‘उसने बुलाया था’ लिखने वाले पीयूष पांडेय। तीनों लेखकों ने अपराध जगत की उन कहानियों पर खुलकर चर्चा की, जिनमें आज का पाठक और दर्शक गहरी दिलचस्पी ले रहा है।चर्चा की शुरुआत इस सवाल से हुई कि आखिर अपराध आधारित कहानियों की लोकप्रियता लगातार क्यों बढ़ रही है। मनोज राजन त्रिपाठी ने कहा कि अपराध की कहानियां सिर्फ सनसनी नहीं होतीं, बल्कि वे समाज के अंधेरे पहलुओं को उजागर करती हैं। उनके अनुसार, जब वे ‘कोड काकोरी’ लिख रहे थे, तो उनका उद्देश्य केवल थ्रिल पैदा करना नहीं था, बल्कि इतिहास और अपराध के बीच के जटिल रिश्तों को समझाना भी था। उन्होंने कहा कि पाठक अब सतही कहानियों से आगे बढ़ चुका है, वह गहराई, तथ्य और मानवीय संघर्ष को समझना चाहता है।संजीव मिश्रा ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि ‘बवाली कनपुरिया’ जैसी कहानी लिखते समय उन्होंने स्थानीय परिवेश, भाषा और संस्कृति को प्रमुखता दी। उनका मानना है कि अपराध की कहानियां तभी असरदार बनती हैं जब उनमें जमीन की सच्चाई झलकती हो। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अपराध और राजनीति के संबंधों ने कई वास्तविक कथानक दिए हैं, जो लेखकों के लिए सामग्री बनते हैं। लेकिन जिम्मेदारी यह है कि कहानी में रोमांच हो, पर अपराध का महिमामंडन न हो।
पीयूष पांडेय ने चर्चा को एक अलग दिशा देते हुए कहा कि अपराध कथाओं में मनोविज्ञान की भूमिका बेहद अहम है। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने ‘उसने बुलाया था’ लिखा, तो उनका ध्यान इस बात पर था कि अपराध के पीछे छिपी मानवीय कमजोरियों, महत्वाकांक्षाओं और भावनाओं को समझा जाए। उन्होंने यह भी कहा कि आज वेब सीरीज और डिजिटल प्लेटफॉर्म के दौर में अपराध कथाएं नए रूप में सामने आ रही हैं, जिससे लेखकों पर शोध और प्रामाणिकता की जिम्मेदारी और बढ़ गई है।मंच पर मौजूद तीनों लेखकों ने इस बात पर सहमति जताई कि अपराध आधारित कहानियां समाज का आईना होती हैं। वे यह दिखाती हैं कि व्यवस्था की कमजोरियां कहां हैं, सत्ता और अपराध का गठजोड़ कैसे काम करता है और आम आदमी इन सबके बीच कैसे प्रभावित होता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लेखक का काम अपराध को ग्लैमराइज करना नहीं, बल्कि उसके परिणामों को ईमानदारी से प्रस्तुत करना है।चर्चा के दौरान दर्शकों ने भी सवाल पूछे। एक श्रोता ने पूछा कि क्या अपराध की कहानियां युवाओं को गलत दिशा में ले जा सकती हैं? इस पर मनोज राजन त्रिपाठी ने कहा कि अच्छी कहानी हमेशा सही संदेश देती है। अगर लेखक जिम्मेदारी के साथ लिखे, तो अपराध कथा चेतावनी बन सकती है, प्रेरणा नहीं। संजीव मिश्रा ने जोड़ा कि पाठक अब समझदार है, वह काल्पनिक और वास्तविकता के फर्क को समझता है।कार्यक्रम के अंत में यह स्पष्ट हुआ कि अपराध और माफिया की कहानियां सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी हैं। आज हर पाठक और दर्शक इन कहानियों में दिलचस्पी इसलिए लेता है क्योंकि वे उसे रोमांच के साथ-साथ समाज की जटिल सच्चाइयों से भी रूबरू कराती हैं। ‘साहित्य आजतक लखनऊ’ के इस सत्र ने यह साबित कर दिया कि क्राइम फिक्शन अब हाशिये की विधा नहीं, बल्कि साहित्य और लोकप्रिय संस्कृति के केंद्र में आ चुका है।
रिपोर्ट – अभिनव गुप्ता
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Desk SBN :‘साहित्य आजतक लखनऊ’ में गूंजा अपराध कथाओं का संसार क्राइम फिक्शन के तीन लेखकों ने खोले रहस्य
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