फ़रीदाबाद से मिले विस्फोटक को जांच के लिए श्रीनगर ले जाया गया. सैंपल की जांच के दौरान नौगाम थाना परिसर में विस्फोट हो गया. इस घटना में 9 लोगों की मौत हो गई है. 32 घायल हैं. घायलों का इलाज आर्मी बेस और SKIMS सौरा हॉस्पिटल में जारी है. आइए, इस हादसे के बहाने जानते हैं कि आखिर किसी विस्फोटक के सैंपल लेने, संरक्षित करने, जांच करने और रिपोर्ट तैयार करने का पूरा प्रोटोकाल, सामान्य वैज्ञनिक व कानूनी प्रक्रिया क्या है? सब कुछ क्रम से समझते हैं.
किसी भी संदिग्ध विस्फोटक के मिलने पर पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह परिसर को खाली करवाकर इलाके की घेराबंदी कर दे. आम लोगों और गैर-प्रशिक्षित पुलिसकर्मियों को संदिग्ध वस्तु से दूर किया जाता है. आम तौर पर 100500 मीटर तक का सुरक्षा घेरा परिस्थितियों के अनुसार तय किया जाता है. इसके साथ ही बम निष्क्रिय दस्ता (Bomb Disposal Squad BDS) और FSL टीम को बुलाना जरूरी है.
प्राइमरी स्तर पर राज्य पुलिस का BDS, डॉग स्क्वॉड और फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की टीम मौके पर बुलायी जाती है. प्राथमिक जिम्मेदारी यह होती है कि विस्फोटक सक्रिय है या नहीं, उसमें ट्रिगर मैकेनिज़्म है या नहीं? ऐसे मामलों में दो स्थितियां बनती हैं. अभी तक विस्फोट न हुआ हो और live explosive मौजूद हो. या विस्फोट हो चुका हो और पोस्ट ब्लास्ट सीन हो, जहां अवशेष (Residues) और मलबे से सबूत लिए जाते हैं. दोनों स्थितियों में सैंपल लेने का तरीका, सुरक्षा मानक और कानूनी प्रक्रिया थोड़ी अलग होती है, पर मूल सिद्धांत समान रहते हैं-सुरक्षा, संरक्षा (preservation) और दस्तावेज़ीकरण.
कुछ ऐसा था ब्लास्ट.
क्या है विस्फोटक का सैंपल लेने की पूरी प्रक्रिया
प्री-ब्लास्ट (Live Explosive) की स्थिति में सबसे पहले एजेंसियां रिस्क असेसमेंट (Risk Assessment) करती हैं. बम निरोधक दस्ता मूलतः यह काम करता है. यह दस्ता पहले यह तय करता है कि वस्तु को वहीं निष्क्रिय करना है या सुरक्षित रूप से हटाकर नियंत्रित स्थान पर ले जाना है. अक्सर संदिग्ध IED को Remote Handling Tools और रोबोटिक उपकरणों की मदद से संभाला जाता है. निष्क्रिय किए बिना सीधा नमूना लेना सामान्यतः वर्जित है.
सक्रिय विस्फोटक से सीधे काटकर नमूना लेना अत्यंत जोखिम भरा होता है, इसलिए आमतौर पर पहले डिवाइस को Render Safe Procedure (RSP) के तहत निष्क्रिय किया जाता है. डेटोनेटर, टाइमर, बैटरी, वायरिंग आदि हटाए जाते हैं. कभी-कभी सुरक्षित नियंत्रित स्थान पर कंट्रोल्ड एक्सप्लोजन किया जाता है, ताकि केवल अवशेष से ही रासायनिक विश्लेषण हो सके.
स्टेनलेस स्टील चाकू, स्क्रेपर, स्पैटुला, स्वैब, ग्लास वायल, सीलबंद पॉलीथिन बैग, पेपर पैक, लेबल आदि का इस्तेमाल सैंपल एकत्र करने में किया जाता है. अधिकारी PPE (Helmet, Blast Suit, Face Shield, Gloves) पहनकर ही काम करते हैं. यदि ठोस विस्फोटक है (जैसे जिलेटिन स्टिक, प्लास्टिक एक्सप्लोसिव, पाउडर आदि), तो आमतौर पर 550 ग्राम तक नमूना पर्याप्त होता है. ज्यादा मात्रा जोखिम ही बढ़ाती है.
फॉरेंसिक विश्लेषण के लिए थोड़ी सी भी मात्रा अक्सर पर्याप्त होती है. विस्फोट के बाद की स्थिति में बदल जाती है. तब टीम क्रेटर, दीवार, वाहन, कपड़ों से अवशेष लेती है. विस्फोट स्थल पर बने गड्ढे, दीवार पर जमा काला पदार्थ, छर्रे, तार, बैटरी के अवशेष, सर्किट बोर्ड, मिट्टी, कंक्रीट आदि से नमूने लिए जाते हैं. घटना स्थल के अलग-अलग पॉइंट से अलग-अलग सैंपल लिए जाते हैं, ताकि यह पता चल सके कि विस्फोटक कहां-कहां फैला था और किस प्रकार का था?
ब्लास्ट ऐसा था कि घरों की खिड़कियां तक हिल गईं
🚨Can you IMAGINE?
Explosives seized from Faridabad (including ammonium nitrate) were brought to the Nowgam Police Station in Srinagar for examination by police and forensic experts, and they exploded unexpectedly.
The blast was so powerful that it killed at least 13 police pic.twitter.com/URdsNFPTbT
— Mohit Chauhan (@mohitlaws) November 15, 2025
पैकिंग, लेबलिंग और चेन ऑफ कस्टडी
विस्फोटक के नमूने का सुरक्षित परिवहन और कानूनी विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए Chain of Custody सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. विस्फोटक अवशेष को अक्सर कागज़ के पैकेट या ग्लास कंटेनर में पैक किया जाता है, ताकि नमी और रासायनिक प्रतिक्रिया न हो. प्लास्टिक के पैक का उपयोग सावधानी से किया जाता है, क्योंकि कुछ सॉल्वेंट या विस्फोटक घटक प्लास्टिक के साथ प्रतिक्रिया कर सकते हैं, लेकिन आम तौर पर सैंपल बैग विशेष ग्रेड के होते हैं.
पैकेट, वायल को मोम-सील, टेप-सील या लेबल-सील से बंद किया जाता है. सील पर केस नंबर, थाना, तारीख, समय, जब्त करने वाले अधिकारी के हस्ताक्षर, मुहर आदि स्पष्ट लिखे होते हैं. हर सैंपल को एक यूनीक आईडी दी जाती है. FSL रेफरेंस फॉर्म में सैंपल का विवरण, केस की FIR संख्या, धाराएं, जब्ती की तारीख, गवाहों के नाम आदि दर्ज होते हैं.
नमूना जब्त करने वाले अधिकारी से लेकर, थाना मालखाना, परिवहन के दौरान और FSL में प्राप्ति तक हर हैंडओवर का रिकॉर्ड लिखा जाता है. किसने कब किसे सैंपल सौंपा, कौन सा सील उपयोग हुआ, कितने पैकेट थे, सब विवरण रजिस्टर में नोट होता है. यही रिकॉर्ड बाद में कोर्ट में साक्ष्य की विश्वसनीयता की रीढ़ होता है.
देश के हर राज्य की राजधानी या बड़े शहर में मुख्य FSL होती है.
सैंपल की जांच कहां और कैसे होती है?
इसमें फोरेंसिक साइंस लेबोरेट्री (FSL) की भूमिका महत्वपूर्ण है. भारत में विस्फोटक परीक्षण मुख्यतः राज्य और केंद्र सरकार की फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं में होता है. लगभग हर राज्य की राजधानी या बड़े शहर में मुख्य FSL होती है, और कुछ जगह ज़ोनल या रीजनल FSL भी हैं. केंद्रीय फॉरेंसिक प्रयोगशालाएँ दिल्ली, हैदराबाद, चंडीगढ़, कोलकाता, पुणे आदि शहरों में हैं. NIA, DRDO की कुछ लैब्स भी हैं तो आर्मी एवं BSF की लैब्स भी विस्फोटक विश्लेषण करती हैं, पर वे आमतौर पर विशेष मामलों में शामिल होती हैं.
कैसे होती है टेस्टिंग?
प्रारंभिक निरीक्षण में नमूने का रंग, बनावट, गंध, आकार, पैकेजिंग आदि की मौजूदगी देखी जाती है. माइक्रोस्कोप से सूक्ष्म कणों की संरचना देखी जा सकती है. इसके बाद यंत्रगत विश्लेषण (Instrumental Analysis) शुरू होते हैं. फिर बारी आती है तुलनात्मक अध्ययन की. यदि किसी संदिग्ध फैक्ट्री, गोदाम, या कारखाने से बरामद विस्फोटक और घटना स्थल से मिले अवशेष की तुलना करनी हो तो घटकों की मात्रा, प्रोफ़ाइल, निर्मात्री विशेषता आदि देखे जाते हैं. तब बनती है रिपोर्ट. जिसमें यह लिखा होता है कि नमूने में किस प्रकार का विस्फोटक पदार्थ पाया गया. यह भी उल्लेख होता है कि यह पदार्थ Explosives Act या UAPA में परिभाषित विस्फोटक पदार्थ की श्रेणी में आता है या नहीं. रिपोर्ट पर FSL के वैज्ञानिक के हस्ताक्षर होते हैं और यह केस डायरी के साथ कोर्ट में साक्ष्य के रूप में जाता है.
प्रारंभिक स्क्रीनिंग में एक से तीन दिन का समय लगता है.
सैंपल जांच में कितना समय लगता है?
समय कई कारकों पर निर्भर करता है. साधारण विस्फोटक बरामदगी और बड़ी आतंकी घटना या बड़े धमाके की जांच में प्राथमिकता का स्तर अलग होता है. गंभीर मामलों में Priority Basis पर रिपोर्ट जल्दी दी जाती है. लैब की क्षमता भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है. कई राज्यों के FSL में मामलों का बैकलॉग है, जिससे सामान्य मामलों में समय बढ़ सकता है. फिर भी औसत समय सीमा कुछ इस प्रकार है. प्रारंभिक स्क्रीनिंग में एक से तीन दिन का समय लगता है. विस्तृत यंत्रगत विश्लेषण और रिपोर्ट में आमतौर पर दो से छह सप्ताह लग सकते हैं. प्राथमिक रिपोर्ट पुलिस को जल्दी दी जा सकती है, जबकि विस्तृत और फाइनल रिपोर्ट बाद में भी आ सकती है.
कोर्ट या जांच एजेंसी की मांग पर त्वरित जांच
हाई-प्रोफाइल या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में 2472 घंटे के भीतर भी प्राथमिक रिपोर्ट दी जा सकती हैं, हालांकि यह प्रयोगशाला की संसाधन स्थिति पर निर्भर करता है. फ़रीदाबाद से विस्फोटक जांच के लिए श्रीनगर ले जाए गए सैंपल के संदर्भ में जिस प्रकार थाना परिसर में परीक्षण या हैंडलिंग के दौरान विस्फोट हुआ, वह सुरक्षा प्रोटोकॉल की महत्ता को और बढ़ा देता है. सामान्यतः सुरक्षा के कुछ मुख्य सिद्धांत हैं. थाना परिसर में Live Explosive का हैंडलिंग न्यूनतम हो. सक्रिय या संभावित रूप से सक्रिय विस्फोटक को थाना, अदालत या भीड़भाड़ वाले इलाकों में न खोला जाए, न टेस्ट किया जाए. केवल नियंत्रित और तकनीकी रूप से सुसज्जित स्थान में ही हैंडलिंग हो.
विशेष कंटेनर और सुरक्षित परिवहन
परिवहन के दौरान विस्फोटक को विशेष कंटेनर में रखा जाता है, ताकि आकस्मिक विस्फोट की स्थिति में नुकसान कम से कम हो. बिना आवश्यकता सैंपल की मात्रा ज़्यादा न रखना महत्वपूर्ण तथ्य है. रासायनिक विश्लेषण के लिए कुछ ग्राम ही पर्याप्त होते हैं; बड़ी मात्रा केवल जोखिम बढ़ाती है. पुलिस, BDS, FSL कर्मियों को नियमित रूप से विस्फोटक हैंडलिंग, PPE उपयोग, आपातकालीन प्रतिक्रिया आदि का प्रशिक्षण दिया जाता है.
इस तरह हम समझ सकते हैं कि विस्फोटक सैंपल लेने और जांच करने की प्रक्रिया में वैज्ञानिक तकनीक के साथ-साथ कड़े सुरक्षा और कानूनी प्रोटोकॉल का पालन अनिवार्य है. सैंपल लेनाकेवल प्रशिक्षित कर्मी, उचित PPE, और जोखिम का आकलन करते हुए किये जाएं. एडहॉक तरीके से थाने में खोलकर देख लेना जैसे निर्णय घातक हो सकते हैं. हर सैंपल का दस्तावेज़ीकरण, सीलिंग, लेबलिंग और रिकार्डिंग कोर्ट में साक्ष्य की वैधता के लिए जरूरी है.
फ़रीदाबादश्रीनगर प्रकरण जैसे हादसे यह याद दिलाते हैं कि विस्फोटक किसी एक व्यक्ति या संस्था की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि एक समन्वित प्रणाली की परीक्षा होते हैं, जिसमें पुलिस, फॉरेंसिक वैज्ञानिक, प्रशासन और नीतिगत ढांचा सब शामिल हैं. प्रोटोकॉल का हर कदम, चाहे वह सैंपल की एक छोटी-सी मात्रा चुनने का निर्णय हो या परीक्षण स्थल का चयन, जीवन और मृत्यु का फ़र्क तय कर सकता है.
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