बिहार में पंजाब-आंध्र से ज्यादा हैं स्टार्टअप
Bihar Election: आज 6 नवंबर को बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 18 ज़िलों की 121 सीटों पर वोटिंग हो रही है. इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा इस बार पलायन रहा है. लगभग हर पार्टी ने वादा किया है कि अगर वो सत्ता में आई, तो बिहार के युवाओं को काम के लिए घर छोड़कर बाहर नहीं जाना पड़ेगा. कोई सरकारी नौकरी देने की बात कर रहा है, तो कोई मज़दूर फैक्ट्री की छवि मिटाने की कसमें खा रहा है.
लेकिन इन सियासी वादों और आरोपों के शोर के बीच एक ऐसी खबर भी है जो बिहार की बदलती तस्वीर दिखाती है. ये खबर आंकड़ों की है, जो बताती है कि जिस बिहार को अब तक सिर्फ मज़दूरों के पलायन के लिए जाना जाता था, वही बिहार अब स्टार्टअप हब बनने की दौड़ में चुपचाप आगे बढ़ रहा है.
आखिर क्यों है पलायन सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा?
यह सच किसी से छिपा नहीं है कि बिहार सालों से बेरोजगारी और पलायन की समस्या से जूझ रहा हैं. 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, देशभर में 45 करोड़ से ज़्यादा लोग ऐसे थे जो अपने घर से पलायन करके किसी दूसरी जगह रह रहे थे. इनमें से 74.54 लाख प्रवासी बिहार के रहने वाले थे. जनगणना के आंकड़े के मुताबिक, बिहार के 13.36 लाख लोग झारखंड में रहते थे. इसके अलावा दिल्ली में 11.07 लाख, पश्चिम बंगाल में 11.04 लाख, उत्तर प्रदेश में 10.73 लाख और महाराष्ट्र में 5.69 लाख बिहारी प्रवासी रह रहे थे. वहीं 2024 में आई इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) की रिपोर्ट तो यहां तक कहती है कि बिहार के करीब 39% प्रवासी काम की तलाश में ही राज्य छोड़ने को मजबूर हैं. यही वजह है कि इस चुनाव में भी हर पार्टी, चाहे वो सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, या पहली बार चुनावी राजनीति में उतरे प्रशांत किशोर, सभी ‘पलायन’ को ही खत्म करने का दम भर रहे हैं.
स्टार्टअप्स की दौड़ में बिहार ने कई राज्यों को पछाड़ा
एक तरफ जहां पलायन की यह गंभीर तस्वीर है, वहीं दूसरी ओर एक नई कहानी भी जन्म ले रही है. जनवरी 2016 में जब केंद्र सरकार ने ‘स्टार्टअप इंडिया इनिशिएटिव’ शुरू किया, तब शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि बिहार इस रेस में इस तरह शामिल होगा. लेकिन सरकारी आंकड़े एक अलग ही हकीकत बयां कर रहे हैं.
आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2016 से लेकर 31 जनवरी 2025 तक, बिहार में कुल 3,286 नए स्टार्टअप्स को मान्यता दी गई है. दिलचस्प और हैरानी की बात यह है कि इस मामले में बिहार ने आंध्र प्रदेश, पंजाब और अपने पड़ोसी झारखंड जैसे राज्यों को भी पीछे छोड़ दिया है.
- बिहार: 3,286 स्टार्टअप
- आंध्र प्रदेश: 2,639 स्टार्टअप
- छत्तीसगढ़: 1,776 स्टार्टअप
- पंजाब: 1,775 स्टार्टअप
- झारखंड: 1,515 स्टार्टअप
- असम: 1,514 स्टार्टअप
स्टार्टअप्स की कुल संख्या के मामले में बिहार अब देश में 13वें स्थान पर पहुंच गया है, जो महाराष्ट्र (28,511) और कर्नाटक (16,954) जैसे शीर्ष राज्यों से तो बहुत पीछे है, लेकिन यह बढ़त कई स्थापित राज्यों की तुलना में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है.
कैसे बदल रही है बिहार की हवा?
यह बदलाव रातोरात नहीं आया, लेकिन इसकी रफ्तार पिछले 5 सालों में तेजी से बढ़ी है. आंकड़ों को गहराई से देखें तो पता चलता है कि बिहार के कुल 3,185 (2024 तक) स्टार्टअप्स में से लगभग 90 फीसदी यानी 2,835, साल 2020 से 2024 के बीच ही खुले हैं. यह दिखाता है कि राज्य में एक नया एंटरप्रेन्योरशिप (उद्यमिता) का माहौल बन रहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार को स्टार्टअप हब बनाने का जो वादा किया था, ये आंकड़े उसी दिशा में एक कदम माने जा सकते हैं. इन स्टार्टअप्स ने नौकरियों के अवसर भी पैदा किए हैं. 31 जनवरी 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, इन स्टार्टअप्स में 30,610 लोगों को रोजगार मिला. इसमें भी 87% से ज्यादा नौकरियां पिछले 5 सालों में ही पैदा हुई हैं.
अभी भी हैं कई चुनौतियां
हालांकि, यह तस्वीर जितनी चमकदार दिखती है, उतनी है नहीं. बिहार भले ही स्टार्टअप्स की संख्या में आगे निकल रहा हो, लेकिन अभी भी कई चुनौतियां बाकी हैं. पटना में 650 से ज्यादा स्टार्टअप्स के साथ यह मुख्य केंद्र बना हुआ है, लेकिन मुजफ्फरपुर (69) और पूर्वी चंपारण (64) जैसे जिले अभी बहुत पीछे हैं.
स्टार्टअप बिहार की वेबसाइट खुद मानती है कि कई स्टार्टअप अभी बहुत छोटे स्तर पर हैं. 667 स्टार्टअप्स का सालाना रेवेन्यू 1 लाख रुपये से भी कम है. दूसरी तरफ, बिहार में बेरोजगारी दर 2018-19 के 31% से घटकर 2023-24 में 10% के आसपास आई है, जो सुधार तो है, लेकिन अभी भी एक बड़ी चुनौती है.

