उम्र के शतक की ओर बढ़ते आडवाणी जी अब राजनीति और सार्वजनिक जीवन से दूर हैं.
राम मंदिर के निर्माण के लिए लाल कृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या की दस हजार किलो मीटर की रथ यात्रा ने देश की राजनीति पर दूरगामी असर डाला. भाजपा ने लंबी छलांग लगाई. कुशल संगठनकर्ता और विचारक आडवाणी को जननेता की छवि हासिल हुई. यात्रा केंद्र की विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार के पतन का कारण बनी. दूसरी ओर उसके विरोध में डट कर बिहार में लालू प्रसाद यादव और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने मुस्लिम वोट बैंक पर कब्जा जमाया.
उम्र के शतक की ओर बढ़ते आडवाणी जी अब राजनीति और सार्वजनिक जीवन से दूर हैं. मुलायम सिंह नहीं हैं लेकिन उनकी अगली पीढ़ी पिता से विरासत में मिले मुस्लिम वोट बैंक को मजबूती से संजोए हुए है. सजायाफ्ता लालू खुद चुनाव मैदान में नहीं हैं लेकिन पुत्र तेजस्वी के जरिए सजातीय यादव वोट के साथ मुस्लिम वोटों के जोड़ ने उन्हें बिहार की सत्ता का तगड़ा दावेदार बना रखा है.
आज आडवाणी का जन्मदिन है. 11 नवंबर को बिहार विधानसभा के चुनाव का दूसरा और आखिरी चरण हैं. इस मौके पर पढ़िए, रथयात्रा के दौरान आडवाणी की बिहार में गिरफ्तारी और इस फैसले को लेकर चले गए दांव-पेंच की कहानी.
यात्रा की शुरुआत में सब कुछ अनिश्चित
25 सितंबर 1990 को सोमनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग का पूजन करके आडवाणी जब रथ पर सवार हुए तो सब कुछ अनिश्चित था. मौसम और यात्रा की कामयाबी दोनों. लेकिन आगे बढ़ती यात्रा हर अगले दिन रथयात्री और समर्थकों का आत्मविश्वास बढ़ाती गई. जिस रास्ते रथ गुजरता उस पर फूल बरसते. महिलाएं आरती उतारती थीं. आडवाणी ने अपनी आत्मकथा में लिखा, “यह अहसास करने में मुझे देर नहीं लगी कि लोगों के लिए मैं महत्वपूर्ण नहीं था. में तो सिर्फ सारथी था. रथयात्रा का प्रधान दूत तो स्वयं रथ ही था और वह रथ सचमुच पूजनीय था, क्योंकि वह राम जन्मस्थान पर राम मंदिर निर्माण उद्देश्य से अयोध्या जा रहा था.”
रथ यात्रा के दौरान लाल कृष्ण आडवाणी और पीएम मोदी. फोटो: PTI
यात्रा के उत्साह बीच दिल्ली में भारी हलचल
आडवाणी और उनके साथी भले यात्रा को लेकर उत्साहित थे. लेकिन दिल्ली में हलचल थी. सेक्युलर ताकतें यात्रा को सांप्रदायिक एकता के लिए खतरनाक और खूनी करार दे रही थीं. विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार भाजपा के समर्थन पर टिकी थी. लेकिन अन्य सहयोगियों के साथ विपक्ष भी यात्रा को रोकने और आडवाणी की गिरफ्तारी की मांग कर रहा था. विश्वनाथ प्रताप सिंह के सामने सरकार बचाने के साथ ही मुस्लिम मतों को संजोए रखने की दोहरी चुनौती थी. बैठकों का सिलसिला चल रहा था. लेकिन समझौते का कोई कारगर फार्मूला नहीं निकल पा रहा था. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव और विश्वनाथ प्रताप के बीच भी अविश्वास की खाई गहरी थी. मुलायम को लगता था कि अयोध्या के मसले में विश्वनाथ प्रताप उन्हें किनारे करने पर तुले हुए हैं.
मुलायम सिंह यादव.
मुलायम सिंह यादव ने ली अतिवादी लाइन
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी बहुचर्चित किताब “युद्ध में अयोध्या” में लिखा कि वी.पी.सिंह और मुलायम सिंह के बीच गहरे पाले खिंच गए थे. प्रधानमंत्री ने साधु-संतों से बातचीत के रास्ते इसलिए खोले, क्योंकि भाजपा से टकराव उनकी सरकार के हित में नहीं था. उसके समर्थन से केंद्र की सरकार चल रही थी.
केंद्र सरकार जानती थी कि टकराव से समस्या का समाधान नहीं होगा. लेकिन माहौल जस का तस बना रहा तो सरकार चलाना भी मुश्किल होगा. उधर वी.पी.सिंह से हिसाब चुकाने के लिए मुलायम सिंह यादव ने अतिवादी लाइन ली. वे बाबरी समर्थकों के पाले में चले गए. बाबरी एक्शन कमेटी के तीन संयोजकों में एक आजम खान को मंत्री, दूसरे शफीक-उर-रहमान वर्क को सांसद और तीसरे जफरयाब जिलानी को कानूनी सलाह के लिए साथ रखा.
लालू प्रसाद यादव.
लालू और मुलायम बीच सेक्युलर चैंपियन की होड़
उत्तर प्रदेश से अलग बिहार में लालू प्रसाद यादव भी मुस्लिम वोटों को पाले में करने के लिए बेचैन थे. यात्रा बिहार पहुंच चुकी थी. जनता दल की धड़ेबंदी में लालू उन दिनों विश्वनाथ प्रताप सिंह के नजदीक थे. लालू और मुलायम के बीच भी खुद को एक-दूसरे से बड़ा सेक्युलर साबित करने की होड़ थी.
लालू ने 23 अक्तूबर को समस्तीपुर में यात्रा रुकवा दी. आडवाणी को गिरफ्तार करके बिहार-बंगाल के सीमावर्ती जिले दुमका के मासनजोर डाक बंगले में रखा गया. क्या लालू ने यह गिरफ्तारी विश्वनाथ प्रताप सिंह के कहने पर कराई? “मंजिल से ज्यादा सफर” में विश्वनाथ प्रताप सिंह का ऐसा ही दावा है.
उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय को बताया था, “भाजपा और विश्व हिंदू परिषद से बातचीत टूट जाने के बाद साफ हो गया कि सरकार नहीं चलेगी. इसके बाद मैंने बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को फोन किया और कहा कि लाल कृष्ण आडवाणी को बिहार में ही गिरफ्तार कर लेना चाहिए. उन्हें यह भी सलाह दी कि रात में दो बजे के बाद ही गिरफ्तारी करनी चाहिए ताकि गिरफ्तारी अखबारों की सुर्खी न बने.”
लाल कृष्ण आडवाणी (Getty Images)
वी. पी. सिंह ने एक तीर से किए दो शिकार
विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार जा रही थी. उनकी एक लड़ाई भाजपा और मंदिर समर्थकों से चल रही थी. दूसरी लड़ाई सेक्युलर ताकतों की आपस की थी. हेमंत शर्मा के अनुसार वी.पी. सिंह ने एक तीर से दो शिकार किए. आडवाणी को गिरफ्तार कराया और मुलायम को पटखनी दी.
वी.पी. सिंह के अयोध्या भूमि अधिग्रहण आदेश का विरोध कर मुलायम सिंह यादव धर्मनिरपेक्षता के इकलौते झंडाबरदार बने थे. वी.पी. सिंह ने इसकी हवा निकालने की तरकीब ढूंढी. पहले आडवाणी के रथ को देवरिया में रोका जाना था. मुलायम सिंह यादव रथ रोकने वाले नेता बनते. वी.पी. सिंह को यह मंजूर नहीं था. अरुण नेहरू के अनुसार प्रधानमंत्री ने लालू को संदेश भेजा कि वे आडवाणी को बिहार में ही रोक लें, ताकि धर्मनिरपेक्षता का सारा नेतृत्व मुलायम सिंह के पास ही न रहे.
लालू का दावा- गिरफ्तारी का फैसला मेरा अपना
वी.पी. सिंह का दावा कुछ भी हो. अन्य सूत्र भी भले इसकी पुष्टि करें. लेकिन आडवाणी की गिरफ्तारी के श्रेय में लालू को किसी की हिस्सेदारी कुबूल नहीं है. अपनी आत्मकथा “गोपालगंज से रायसीना” में इस मसले में लालू ने लिखा, “सच कहूं तो किसी ने मुझे इस यात्रा को रोकने या आडवाणी को गिरफ्तार करने के लिए नहीं कहा था. मुफ्ती मोहम्मद सईद जो उस समय गृहमंत्री थे, ने मुझे दिल्ली बुलाकर जानकारी ली कि क्या मैंने आडवाणी को रोकने की कोई योजना बनाई है? जब मैंने इस बारे में कुछ साफ-साफ नहीं कहा तो वह कहने लगे, आप इसे अपने ऊपर क्यों लेना चाहते हैं? यात्रा को जारी रहने दीजिए. मैंने बेहद सख्त लहजे में कहा आप सबको सत्ता का नशा चढ़ गया है.”
भाषण देते लाल कृष्ण आडवाणी के साथ पीएम मोदी. फोटो: Getty Images
हरी पगड़ी जिसे लालू ने बेडरूम में संजोया
विपक्षियों की निगाह में भाजपा रथयात्रा के जरिए अपने राजनीतिक हित साध रही थी, तो रथयात्रा को रोकने के मकसद भी राजनीतिक ही थे. आडवाणी की गिरफ्तारी को अकेले अपना फैसला बताते लालू बिहार में एम-वाई गठजोड़ की मजबूत जमीन तैयार कर रहे थे. लालू ने लिखा, “रथयात्रा के तनाव भरे माहौल के बीच मैं बिहार शरीफ़ गया,जहां के लोगों ने मुझे हरी पगड़ी भेंट की. मैं उसे अपने घर ले आया और खुद से कहा कि यह पगड़ी उस भरोसे का प्रतीक है, जो अल्पसंख्यक समुदाय मुझ पर रखता है.
इस देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को मुझे हर हाल में बचाना होगा. उस पगड़ी को मैंने अपने बेडरूम में रखा और प्रतिज्ञा की कि राज्य में साम्प्रदायिक भाई-चारा बनाए रखने की अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटूंगा. मेरे दिमाग में यह बात साफ थी कि आडवाणी की रथयात्रा अल्पसंख्यक समुदाय और साम्प्रदायिक भाई – चारे के लिए वास्तविक खतरा है. सख्त कदम उठाने का मन बना लेने के बाद राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मैंने बैठक की और उनसे कहा यात्रा रोकनी होगी. आडवाणी के साथ ही अशोक सिंहल और उनके साथ के संघ परिवार के अन्य नेताओं को भी गिरफ्तार कीजिए.”
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