हर साल 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाया जाता है क्योंकि भारत का संविधान 26 नवम्बर 1949 को बनकर तैयार हुआ था.
संविधान निर्माण के समय राज्यों में राज्यपाल की जरूरत पर सबसे ज्यादा सवाल उठे थे. सुझाव राज्यपाल के चुनाव के भी थे भी लेकिन ऐसी दशा में चुने मुख्यमंत्री से टकराव की आशंका में अंततः सहमति राष्ट्रपति द्वारा उनकी नियुक्ति पर बनी. गुजरे पचहत्तर वर्षों का इतिहास बताता है नियुक्त राज्यपालों पर केंद्र के इशारे पर काम करने के आरोप लगे और चुनी सरकारों से उनका टकराव लगातार जारी है. समय-समय पर ऐसे विवाद देश की सर्वोच्च अदालत तक भी पहुंचे.
तामिलनाडु मामले में सुप्रीम कोर्ट की एक खंड पीठ के निर्णय ने तो राष्ट्रपति को प्रेसिडेंशियल रेफरेंस के लिए विवश कर दिया. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का इस मसले पर अभिमत न्यायपालिका को लक्ष्मण रेखा के स्मरण और उसके पालन की प्रतिबद्धता का है. लेकिन अदालत ने साफ किया है कि राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह के आधार पर तर्कसंगत समय के भीतर निर्णय लेना अनिवार्य है. यह “तर्कसंगत समय” क्या और कितना है – इस गुत्थी के आगे भी विवाद की वजह बनी रहना तय है. संविधान दिवस के अवसर पर संविधान सभा के हवाले से राज्यपाल पद के सृजन और आगे उन्हें लेकर चल रहे विवादों पर एक नजर.
राज्यपाल चुने जाएं या नियुक्ति हो?
संविधान सभा में राज्यपाल पद के सृजन को लेकर हुई बहस में पहला सवाल था कि उनका चुनाव हो या नियुक्ति. अगला सवाल था कि राज्यपाल के पास वास्तविक कार्यकारी शक्ति हो या केवल यह नाममात्र का पद हो? आशंका थी कि राज्यपाल राज्यों पर केंद्र की पकड़ के साधन तो नहीं बन जाएंगे और क्या यह यह संघीय ढांचे के खिलाफ नहीं होगा? निर्वाचन द्वारा राज्यपाल के चयन के सवाल पर आशंका जाहिर की गई थी कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों के ही निर्वाचित होने की दशा में अधिकारों और उनके उपयोग को लेकर टकराव तय रहेगा. जवाहर लाल नेहरू का कहना था कि इससे केंद्र और प्रांतों में दूरियां बढ़ेंगी. ऐसे समय में जब जब राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है तो राज्यपाल के लिए भी निर्वाचन की व्यवस्था अनावश्यक खर्च बढ़ाएगी. दूसरी ओर केंद्र द्वारा राज्यपालों की नियुक्ति व्यवस्था से अधिक शिक्षित-प्रतिष्ठित व्यक्ति इस पद पर पहुंच सकेंगे. उनकी उपस्थिति राज्यों के शासन में सहयोग और उत्थान में सहायक होगी.

पंडित नेहरू ने कहा था कि यद्यपि निर्वाचन लोकतंत्र की श्रेष्ठ व्यवस्था है लेकिन राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों के ही निर्वाचित होने की दशा में संभावित टकराव, लोकतंत्र के लिए हानिकर होगा. इस बहस में भाग लेने वाले बी.जी. खेर, हृदयनाथ कुंजरू,पी.के. सेन, विश्वनाथ दास,जी.दुर्गाबाई, शिब्बन लाल सक्सेना, के.एम.मुंशी ,सैयद मुहम्मद सादुल्ला, टी. टी .कृष्णमाचारी और डॉक्टर भीम राव आंबेडकर में से अधिकांश वक्ताओं ने राज्यपालों की नियुक्ति का ही समर्थन किया था.
राज्य में केंद्र से भिन्न दल की सरकार, तब होगा टकराव
बेशक राज्यपाल को लेकर आखिरी सहमति राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति पर ही बनी थी लेकिन इस नियुक्ति के सवाल पर कुछ सदस्यों ने जो आशंकाएं व्यक्त की थीं, वे आगे सही साबित हुईं. इस बहस में हिस्सा लेने वाले रोहिणी कुमार चौधरी ने कहा था कि राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री की सलाह पर करनी होगी और प्रधानमंत्री किसी दल विशेष का होगा. स्वाभाविक तौर पर उसका परामर्श निष्पक्ष नहीं होगा.
चूंकि प्रधानमंत्री का परामर्श ऐसे व्यक्ति के लिए होगा, जो उनके दल की विचारधारा का समर्थन करने वाला होगा, अतः ऐसे राज्य जहां दूसरे दल का मुख्यमंत्री और सरकार होगी, वहां राज्यपाल और मुख्यमंत्री के मध्य टकराव की स्थिति बनेगी. चौधरी का सुझाव था कि अगर राज्यपाल के निर्वाचन की व्यवस्था न भी हो सके तो एक नामावली से उनके चयन की व्यवस्था की जानी चाहिए.
स्वविवेक की शक्तियों पर सवाल
राज्यपाल को स्वविवेक से शक्तियां प्रदान करने को लेकर भी मतभिन्नता थी. एच.वी.कामत ने कहा था कि चूंकि राज्यपाल केंद्र से मनोनीत होंगे, इसलिए जब तक आपातस्थिति न हो उन्हें स्वविवेक के अधिकार नहीं दिए जाने चाहिए. शिब्बन लाल सक्सेना ने भी राज्यपाल के स्वविवेक की शक्ति को अनुचित ठहराया था. दूसरी ओर महावीर त्यागी का कहना था कि संविधान में जितनी शक्तियां राज्यों को दी जा रही हैं, उतना ही जरूरी उन पर केंद्र का संरक्षण और नियंत्रण भी है.
केंद्र के अभिकर्ता के रूप में राज्यपाल यह संरक्षण करेगा. त्यागी ने कहा था, लोकतांत्रिक रूचि वन पशु के समान होती है. लोकतंत्र दलों और जनसाधारण के भ्रम-भ्रांति पर चलता है. जरूरी है कि लोकतंत्र अपने मार्ग पर चलता रहे लेकिन अराजकता की स्थिति न उत्पन्न हो. राज्य अपनी नीतियों को आगे बढ़ाएं लेकिन केंद्र के निर्देशन और नीतियों का भी पालन करें. राज्यों को शक्तियां प्राप्त हों लेकिन उन पर नियंत्रण भी जरूरी है. टी. टी.कृष्णमाचारी, बृजेश्वर प्रसाद आदि भी राज्यपाल को अधिक शक्तियां प्रदान करने के पक्ष में थे.
सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम अदालत में दस्तक
राज्यपालों और संबंधित राज्य सरकारों के बीच का टकराव अनेक मामलों में सुप्रीम अदालत की चौखट तक पहुंचा. जाहिर है कि ऐसे सभी विवाद उन राज्यों में उभरे जहां राज्य में केंद्र से भिन्न दलों की सरकार थी. एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) इस मसले का एक महत्वपूर्ण निर्णय है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग संभव है, अतः राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश न्यायिक समीक्षा के दायरे में होगी.
इस निर्णय ने बहुमत का परीक्षण राज्यपाल के सामने नहीं बल्कि सदन के फ्लोर पर निश्चित किए जाने के लिए भी निर्देशित किया. नबाम रेबिया बनाम स्पीकर, अरुणाचल प्रदेश में अदालत ने कहा कि राज्यपाल को विधानसभा की कार्यवाही को प्रभावित करने का अधिकार नहीं है. यह भी निर्देशित किया कि वे किसी विधायक को अयोग्य घोषित करने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकते. महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट पर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा राज्यपाल फ्लोर परीक्षण केवल ठोस सामग्री प्रस्तुत होने पर ही कर सकते हैं.
तामिलनाडु मामले का फैसला लाया तूफान
राज्यपाल के अधिकारों और उनकी सीमाओं को लेकर तमिलनाडु मामले में सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और महादेवन की पीठ के निर्णय ने विवाद के नए सवाल खड़े कर दिए. कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल के पास तीन विकल्प हैं – बिल पर स्वीकृति देना या मन्त्री परिषद की सलाह वापस भेजना या फिर बिल को रिज़र्व करना और राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजना.
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि इन विकल्पों को एक-दूसरे के साथ नहीं मिलाया जा सकता, जब एक विकल्प चुना जाए, बाकी विकल्प स्वतः अनुपलब्ध हो जाते हैं. यह भी कहा कि राज्यपाल के पास विवेकाधिकार कुछ मामलों में हो सकता है, लेकिन यह पूर्ण स्वतंत्रता नहीं है. पीठ ने निर्णय दिया कि राज्यपाल की निष्क्रियता न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती है. इस निर्णय ने तूफान खड़ा कर दिया , क्योंकि इसमें राज्यपाल के लिए विधानमंडल से पारित बिल पर निर्णय की समय सीमाएं तय कर दी गईं थीं. इससे भी आगे जाकर कोर्ट ने तामिलनाडु के गवर्नर द्वारा लंबे समय से रोके गए दस बिलों पर निर्णय की देरी को गलत करार देते हुए अनुच्छेद 142 के अधीन अपने अधिकारों के आधार पर डीम्ड स्वीकृति की अवधारणा को लागू किया और कहा कि इन बिलों को ऐसे माना जाए जैसे उन्हें उसी समय स्वीकृति दी गई हो जब वे राज्यपाल को प्रस्तुत किए गए थे.
तर्कसंगत समय में लेना होगा फैसला
तामिलनाडु मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 143 के अधीन ने इसके परिणामों को लेकर विभिन्न बिंदुओं पर सुप्रीम कोर्ट को प्रेसिडेंशियल रेफरेंस भेजा. कोर्ट की संविधान पीठ ने बिलों पर राज्यपाल के निर्णय की समय सीमा और डीम्ड स्वीकृति की अवधारणा को तो खारिज कर दिया लेकिन साफ किया कि तर्कसंगत समय के भीतर राज्यपाल को निर्णय लेना होगा.
कोर्ट ने कहा राज्यपाल रबर स्टैम्प नहीं हैं, लेकिन वे निर्वाचित सरकार की लोकतांत्रिक इच्छा की अवहेलना भी नहीं कर सकते. कोर्ट ने याद दिलाया कि राज्यपाल संवैधानिक संरक्षक हैं लेकिन वे चुनी सरकार के समानांतर अथॉरिटी नहीं हैं. सुप्रीम अदालत की राय से स्पष्ट है कि राज्यपाल के संविधान प्रदत्त विवेकाधिकार सीमित हैं और अदालतों के रुख के कारण अब राज्यपालों के संवैधानिक आचरण की कसौटी और सख्त हो गई है.
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