राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि बिहार में महागठबंधन की सरकार बनी तो वे वक्फ (संशोधन) अधिनियम कूड़ेदान में फेंक देंगे.
बिहार में विधान सभा चुनाव प्रचार के बीच राजद नेता और महागठबंधन सीएम फेस तेजस्वी यादव ने कहा कि अगर बिहार में महागठबंधन की सरकार बनी तो वे संसद द्वारा पारित वक्फ (संशोधन) अधिनियम को कूड़ेदान में फेंक देंगे. बीते रविवार को एक जनसभा में दिया गया उनका बयान वायरल हो रहा है. समर्थक और विरोधी भी इस मुद्दे पर बहस में जुटे हुए हैं.
राजनीतिक बयान के रूप में नेताओं के बड़बोलेपन से हम सब वाकिफ हैं लेकिन क्या यह वाकई संभव है? संसद के जरिए बने कानून को क्या कोई राज्य सरकार खत्म कर सकती है? क्या है इसकी सच्चाई और कानूनी हकीकत? आइए इसे जान लेते हैं.
क्या है कानूनी स्थिति?
सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी कुमार दुबे कहते हैं कि वक्फ कानून संसद के दोनों सदनों से पास होकर कानूनी रूप में हम सबके सामने है. देश में सभी राज्य सरकारों को इसे लागू करने की कानूनी बाध्यता है. कोई भी राज्य इससे इनकार नहीं कर सकता. यदि कोई केंद्रीय कानून समवर्ती सूची में आता है, तो उसका पालन करने के लिए राज्य भी बाध्य होते हैं, बशर्ते कि वह संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन न करता हो.
वह कहते हैं कि राज्य सरकारों के पास राज्य वक्फ बोर्डों के प्रशासनिक कार्यों में भूमिका निभाने की शक्ति होती है. उसमें वे कुछ जरूरी संशोधन जरूरत के मुताबिक जरूर कर सकते हैं लेकिन केन्द्रीय कानून को रद करना या न मानना कतई किसी भी राज्य सरकार के बस में नहीं है. वक्फ संसद द्वारा बनाया कानून है, जो समवर्ती सूची (Concurrent List) के अंतर्गत आता है, तो राज्य सरकारों को उस कानून का पालन करना ही होगा.
बिहार चुनाव प्रचार के दौरान एक जनसभा में वक्फ कानून को लेकर दिया गया उनका बयान चर्चा में है.
किसके पास कितनी पावर, क्या कहता है संविधान?
भारतीय संविधान में विषयों का विभाजन सातवीं अनुसूची में अंकित है. Charities and charitable institutions, charitable and religious endowments and religious institutions Entry No. 28, List III यानी वक्फ / धार्मिक एन्डोवमेंट्स का विषय Concurrent List (साम्य सूची) में रखा गया है. इसका मतलब यह हुआ कि केंद्र और राज्य दोनों कानून विधान बनाने के अधिकार रखते हैं.
सामान्य नियम के मुताबिक यदि केंद्र (Parliament) और कोई राज्य दोनों ने उस Concurrent विषय पर कानून बनाया और दोनों कानूनों में कोई टकराव है, तो आम तौर पर संसद का कानून राज्य के कानून पर प्राथमिकता पाएगा अर्थात् केंद्र का कानून प्रभावी रहेगा. यहां संविधान ने एक रास्ता और दिया है. यदि राज्य का कानून राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित किया गया और राष्ट्रपति ने उसे सहमति दे दी, तो उस राज्य में वह राज्य कानून पारित कर केंद्र के मुकाबले प्रभावी रह सकता है. लेकिन यहां भी Parliament बाद में किसी भी समय वही विषय लेकर नया कानून बनाकर उस राज्य कानून को ओवर राइड कर सकता है. यह व्यवस्था भी Concurrent List/Article 254 की व्याख्या में आती है. इस तरह राज्य सीधे तौर पर केंद्र के कानून को पलटकर एकतरफ़ा फाड़ नहीं सकता. संविधान ने स्पष्ट प्रोसीजर और सीमाएँ तय कर रखी हैं.

क्या राज्य अपने स्तर पर वक्फ कानून रद्द कर सकता है?
कोई राज्य सरकार, अपने कार्यकाल में, केंद्र के बनाए हुए कानून को प्रशासनिक तौर पर लागू करने में विलंब कर सकती है. पर यह संवैधानिक मर्यादा में नहीं आता. यदि कोई व्यक्ति/संस्था अदालत पहुंचे तो न्यायालय राज्य को वही लागू करने का आदेश दे सकता है. किसी केन्द्रीय क़ानून को औपचारिक रूप से रद्द (repeal) करना केवल संसद कर सकती है. राज्य के पास ऐसी शक्ति नहीं है. राज्य ऐसा कानून पास कर सकता है जो उसी विषय पर अलग प्रावधान रखता हो; पर उपर्युक्त नियम के कारण वह स्वतः ही केंद्रीय कानून को हटाएगा, यह मान्य नहीं है.
हां, राज्य न्यायालय में चुनौती (Constitutional Challenge) दायर कर सकते हैं अगर नये कानून का कोई प्रावधान संविधान के अधिकारों, अनुसूचित सिद्धांतों के खिलाफ हो; सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय संवैधानिक परीक्षण कर सकते हैं.
वक्फ (संशोधन) अधिनियम की पृष्ठभूमि
वक्फ कानून का संचालन पहले से केंद्रीकृत ढांचे तथा राज्य बोर्डों के माध्यम से होता आया है. हाल के वर्षों में वक्फ (संशोधन) बिल/अधिनियम और उसमें किए गए बदलावों पर विवाद चल रहा है. PRS जैसी संस्थाओं ने बिल के प्रावधान, तर्क और विवादों की विवेचना की है. केंद्रीय कानून बन चुका है तो उसका अनुपालन देश भर में केंद्रीय कानून-व्यवस्था के हिसाब से वैध माना जाएगा, जब तक कि संविधानिक चुनौती उसे पलट न दे. साल 1995 का मूल अधिनियम भी केन्द्र द्वारा लाया गया था.
अदालत और संवैधानिक नियंत्रण
अगर कोई राज्य सरकार केंद्र के कानून को प्रशासनिक रूप से लागू करने से मना करना या कानून के प्रावधानों के बारे में उल्टा कानून पास कर देना, तो प्रभावित पक्ष न्यायालय जा सकता है. उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 32/226 आदि के तहत संवैधानिक संरक्षण दे सकते हैं और केंद्र/राज्य दोनों के कृत्यों की वैधता की समीक्षा कर सकते हैं. न्यायपालिका संविधान की Basic Structure और मौलिक अधिकारों की रक्षा भी करती है.
व्यावहारिक और राजनीतिक सच
राजनीतिक स्तर पर राज्य सरकारें केंद्र के कानूनों के खिलाफ आंदोलन, राजनीतिक दबाव, संसद में केंद्र पर अनुरोध या केंद्र की नीति बदलवाने का प्रयास कर सकती हैं. कई बार राज्यों द्वारा विरोध से केंद्र पर दबाव बनता है और संशोधन या रद्दीकरण तक की प्रक्रिया चल सकती है. पर, यह संवैधानिक प्रक्रिया और राजनीतिक संवाद के माध्यम से होगा, न कि एकतरफ़ा फाड़ देने जैसा. कागज फाड़ा जा सकता है, कानून को फाड़ना यूँ भी संभव नहीं है. इस बात की जानकारी तेजस्वी यादव को भी है लेकिन बिहार में चुनाव चल रहा है तो इसे जुमले की तरह देखा जाना चाहिए.
तेजस्वी यादव का बयान संघवाद और कानून पर राजनीतिक संदेश है, लेकिन कानूनी तौर पर एक राज्य सरकार अकेले होकर संसद द्वारा पारित केंद्रीय कानून को कूड़ेदान में फेंक नहीं सकती. निष्प्रभावी नहीं कर सकती. वक्फ का विषय Concurrent List में है, अतः राज्य कानून बना तो सकता है पर उसके और केंद्रीय कानून के बीच विभेद होने पर सामान्यतः केंद्रीय कानून प्राथमिक होगा, सिवाय उस स्थिति के जहाँ राज्य कानून राष्ट्रपति की सहमति लेकर प्रभावी किया गया हो. और तब भी संसद बाद में उसे बदल सकती है. संवैधानिक चुनौतियाँ और राजनीतिक-नैतिक बहसें अलग पहलू हैं, पर कानूनी प्रक्रिया संविधान तय करती है — इसे तोड़ना संभव नहीं.
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