दिल्ली फतह का सपना लेकर निकले तैमूर लंग ने बारूद को हथियार की तरफ इस्तेमाल किया.
तैमूर लंग की दिल्ली पर फतह में बारूद की निर्णायक भूमिका थी, लेकिन उस वक्त उसके पास तोप या बारूद भरे गोले नहीं थे. किले की दीवारों को उड़ाने के लिए सुरंग के जरिए वहां तक पहले पहुंच बनाई गई. फिर दीवार से सटे गड्ढों में बारूद इकट्ठा कर फीते के एक छोर में आग लगाकर धमाके किए गए. बाबर के हमले से 128 साल पहले तैमूर लंग ने 1398 में दिल्ली किले की खाई के पानी के श्रोत रोकने के लिए यमुना नदी पर बंधा बनवाया. किले के आगे की खाई सुखाने के लिए जगह-जगह पत्थर भरे गए. फिर किले की दीवार तक सुरंग बनी और ठिकाने बना बारूद के ढेर लगाए गए. पढ़िए भारत पर हमले में बारूद के पहले इस्तेमाल की कहानी तैमूर लंग की आत्मकथा के हवाले से,
हिंदुस्तान के रास्ते बढ़ते तैमूर लंग का क्वेटा में वहां के बुजुर्ग सुल्तान वली-उल-मुल्क ने स्वागत किया. सुल्तान चाहता था कि तैमूर उसके ही महल में रुके. लेकिन तैमूर ने अपनी छावनी को ही तरजीह दी. दोपहर के खाने के दौरान सुल्तान को जब तैमूर के हिंदुस्तान जीतने के इरादे की जानकारी हुई तो उसने यह इरादा छोड़ने की सलाह दी. जवाब में सुल्तान ने कहा, वहां दो हजार राजा हैं. खुदा सौ साल की भी उम्र देगा तो सबको जीत नहीं पाओगे. तैमूर ने सवाल किया कि फिर महमूद गज़नबी ने कैसे जीत हासिल की?
सुल्तान का कहना था कि उसने हिंदुस्तान का सिर्फ एक कोना जीता था. उसके पहले भी जीत दर्ज करने वाले उस बड़े मुल्क का कोई कोना ही जीत सके. सुल्तान ने तैमूर को हिंदुस्तान के अलग हिस्सों के विपरीत मौसम यानी उत्तर में कड़ाके की ठंड तो दक्षिण में बला की गर्मी और इन सबसे बढ़कर खासतौर पर विदेशियों को चपेट में लेने वाली महामारी का भी खौफ दिखाया. तैमूर अडिग रहा.
तैमूर लंग ने मेरठ के किले की दीवारों को उड़ाने के लिए बारूद को हथियार बनाया.
मेरठ के किले से पत्थरों की बरसात
तैमूर को दिल्ली के रास्ते मेरठ में कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा. मेरठ किले की कमान कोतवाल आलाशर के जिम्मे थी. तैमूर ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया. आलाशर ने कहा कि किसी विदेशी दुश्मन को रास्ता देना उसे कुबूल नहीं है. मेरठ का किला एक टीले पर बना था. किले के प्राचीर पर पत्थर फेंकने वाली तोपें लगी हुई थीं. तैमूर किले की दीवार तक पहुंचने के लिए सेंध लगाना चटाता था. लेकिन ऊपर से बरसते पत्थर उसके सैनिकों को आगे नहीं बढ़ने दे रहे थे. तैमूर ने लिखा कि जिस तरह पत्थर फेंके जा रहे थे, उससे लगता था कि वहां सालों से पत्थर इकट्ठा किए गए थे, जो खत्म ही नहीं हो रहे थे.
बारूद के धमाके से मेरठ किले की दीवार टुकड़े-टुकड़े होकर गिर गई.
वो धमाके जिसमें किले की दीवारें बिखर गईं
तैमूर ने जवाबी रणनीति के लिए रात का समय चुना. किले से कुछ फासले पर चार दीवारी खड़ी करनी शुरू की ताकि उसकी आड़ में सुरंग का काम किले प्राचीर पर तैनात सैनिकों की नज़र में न आए. तैमूर के साथ सेंध बनाने में माहिर एक आदमी शेर बहराम मरुजी था. यह उसका खानदानी पेशा था. जमीन देखते ही बता देता था कि कहां या कितनी गहराई पर पानी है. चारदीवारी की आड़ में खुदाई का काम आसान कर दिया. निकलने वाली मिट्टी भी इसी के आड़ में रखी जाती थी, जिससे किले के सैनिकों को अंदेशा न हो. सुरंग का काम खिंचता जा रहा था.
तैमूर बरसात को लेकर फिक्रमंद था. फिर एक दिन शेर बहराम ने खबर दी कि एक सुरंग का काम पूरा हो गया. दूसरी एक-दो दिन में पूरी हो जाएगी. दोनों सुरंग के किलों को छू रहे छोर पर ठिकाने बना वहां बारूद भरी गई और फीता लगाकर आखिरी सिरा सुरंग से निकाल दिया गया. इस फीते से लगाई गई आग किले की बारूद के ठिकाने तक पहुंची. तैमूर ने लिखा,,” 801 हिजरी 11सफ़र की सुबह आ पहुंची ( 23 या 24 अक्टूबर 1398 ) – जमीन जैसे डोली. ऐसी गरज पैदा हुई जैसे हजारों बिजलियां एक साथ कड़क उठी हों. फिर मेरठ किले की दीवार टुकड़े-टुकड़े होकर गिर गई.”
दिल्ली पर फतह के लिए यमुना पर बंधा
तैमूर ने अगली फतह लोनी के किले पर दर्ज की. दिल्ली के किले के बारे में उसने सुना था कि वहां की दीवारें चालीस गज ऊंची है. लेकिन मौके पर उसने पाया कि इनकी ऊंचाई बारह गज से ज्यादा नहीं है. किले की दीवारों के आगे खाई थी, जिनमें पानी भरा हुआ था. तैमूर ने पहली जानकारी हासिल की कि इसमें पानी कहां से पहुंचता है? इसके बाद यमुना नदी से पहुंचने वाले पानी को रोकना तैमूर की रणनीति का अहम हिस्सा बना.
तैमूर ने जिस बारूद को हथियार बनाया उससे हुए धमाके इतने तेज थे कि कई सिपाहियों के कान फट गए थे. फोटो: Hector Quintanar/Getty Images
शेर बहराम ने तैमूर से कहा जब तक खाई सुखाई नहीं जाती सुरंग खोदी नहीं जा सकती. उसकी तह पक्की नहीं है , इसलिए पानी सुरंग के मुंह पर भर जाएगा. पहली जरूरत है कि खाई में आने वाले पानी को दहाने पर रोका जाए और फिर खाई में मिट्टी-पत्थर डालकर उसे सुखाया जाए. इसके बाद तैमूर ने खाई को यमुना से जोड़ने वाले दहाने पर बंधा बनवाया और फिर पानी की आमद रोकने के बाद पहले से मौजूद पानी को सुखाने का काम शुरू किया. कई दिनों तक यह काम दिन-रात चला. इस बीच किले के भीतर के सैनिकों और तैमूर की सेना से मुकाबला चलता रहा. लेकिन तैमूर की असली रणनीति से दिल्ली का सुल्तान अनजान रहा.
दीवार टूटी लेकिन सिपाहियों ने छक्के छुड़ाए
सुरंग और बारूद का ठिकाना बनाए जाने का काम पूरा होने पर शेर बहराम ने तैमूर से कहा कि अमीर जब चाहो बारूद में आग लगा सकते हो. बारूदी हमले की तैयारी में लगे तैमूर को इसी बीच खबर मिली कि लोनी के किले पर उसका बेटा साद वकास मारा गया. अगली सुबह तैमूर के सैनिकों ने दिल्ली किले के प्राचीर के नीचे रखी बारूद में आग लगा दी. तैमूर के मुताबिक धमाके इतने तेज थे कि हमारे कुछ सिपाहियों के कान फट गए. मैंने सोचा था कि दुश्मन होश खो बैठेगा. लेकिन हिन्दी सिपाहियों के बारे में मेरी सोच गलत निकली. जल्दी ही वे कुल्हाड़े और गदा ले हमारे सिपाहियों से उलझ गए. तैमूर ने लिखा , ” मेरे सिपाही जब शहर में दाखिल हुए तो हिन्दी सिपाही मुकाबले के लिए डटे दिखे. हमारी सेना उनके जिरहबख्तर से टकराकर कोई नुकसान नहीं पहुंचा पा रही थी. हमारी मदद के लिए और भी दस्ते आए लेकिन हिन्दी पीछे हटने को तैयार नहीं थे. इस बीच उनके हाथियों ने भी हमारे कई सैनिकों को कुचला और कई को सूंड से दूर फेंका. हम आगे नहीं बढ़ सकते थे. फिर अगली तैयारी के लिए उस शाम हमने पीछे हटने का फैसला किया.”
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