बालसखी मॉडल Image Credit source: AI Picture
भारत का बालसखी मॉडल बच्चों को कम संसाधनों और कम खर्च में बेहतर शिक्षा देने का एक अनोखा तरीका है. इसे खासकर कमजोर छात्रों के लिए बनाया गया है. इसमें बच्चे अपनी क्लास के लेवल के अनुसार छोटे-छोटे ग्रुप्स में पढ़ते हैं, खेल और गतिविधियों के जरिए सीखते हैं. इस मॉडल की सफलता न केवल भारत में, बल्कि वर्ल्ड बैंक ने भी सराही है. आज यह मॉडल भारत के 23 राज्यों में लागू है और अब इसे दुनिया के अन्य देशों में भी अपनाया जा रहा है.
कमजोर छात्रों के लिए असरदार तरीका
बालसखी मॉडल टीचिंग एट द राइट लेवल का सफल उदाहरण है. इसका उद्देश्य उन बच्चों को पढ़ाना है, जो अपनी क्लास के हिसाब से पिछड़े हुए हैं. मुंबई में 1995 में शुरू हुए प्रथम एनजीओ ने 2001 में इसे लागू किया. मॉडल में स्थानीय प्रशिक्षित युवतियां रोजाना 15 बच्चों को 2 घंटे की पढ़ाई कराती हैं. बच्चे अपने स्तर के अनुसार तीन समूहों में बंटते हैं. इसमें डायग्नोस्टिक टेस्ट, लेवल-बेस्ड प्रैक्टिस, खेल और पढ़ाई की छोटी-छोटी प्रैक्टिस शामिल होती हैं. जैसे ही बच्चा एक स्तर सीखता है, उसे अगले स्तर के लिए तैयार किया जाता है.
वैश्विक स्तर पर बालसखी की सफलता
बालसखी मॉडल अब भारत के 23 राज्यों में काम कर रहा है और इसकी सफलता की तारीफ वर्ल्ड बैंक ने भी की है. उनके दो साल के अध्ययन में पहले साल 0.14 और दूसरे साल 0.28 का सुधार दर्ज हुआ. मॉडल की सालाना लागत मात्र 375 रुपये प्रति छात्र है, जो इसे बेहद किफायती बनाती है.
सबसे प्रभावशाली एजुकेशन मॉडल
नोबेल विजेता एस्थर डुफ्लो इसे दुनिया के सबसे प्रभावशाली एजुकेशन मॉडल में से एक मानती हैं. उनका कहना है कि शिक्षा में सुधार केवल पैसे से नहीं, बल्कि सही तरीके से पढ़ाने से आता है.

