रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध ने अब ऐसा मोड़ ले लिया है जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। यूक्रेन ने न केवल रूस के सीमावर्ती इलाकों बल्कि राजधानी मॉस्को के भीतर तक अपनी पहुंच साबित कर दी है। जिस क्रेमलिन से राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन पूरे रूस का शासन चलाते हैं, उसके आसपास तक ड्रोन हमलों की गूंज सुनाई देने लगी है। साथ ही मॉस्को पर हुए बड़े ड्रोन हमले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि युद्ध अब केवल मोर्चों पर नहीं बल्कि रूस के दिल तक पहुंच चुका है।
राजधानी बचाने उतरा रूस
रूसी अधिकारियों के अनुसार यूक्रेन की ओर से भेजे गए उनसठ ड्रोन राजधानी की तरफ बढ़ रहे थे जिन्हें रूसी वायु रक्षा प्रणाली ने मार गिराया। हालात इतने गंभीर हो गए कि मॉस्को के चारों प्रमुख हवाई अड्डों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। विमानन विभाग ने कहा कि यात्रियों और उड़ानों की सुरक्षा के लिए यह कदम जरूरी था। राजधानी के लोगों ने रातभर धमाकों की आवाजें सुनीं और कई इलाकों में भय का माहौल बन गया। रूस के लिए यह केवल सुरक्षा चुनौती नहीं बल्कि प्रतिष्ठा का भी बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि यूक्रेन अब सीधे उस सत्ता केंद्र तक खतरा पैदा कर रहा है जहां से पुतिन युद्ध संचालन कर रहे हैं।
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हमले बढ़ा रहा यूक्रेन
यूक्रेन ने हाल के महीनों में रूस की ऊर्जा व्यवस्था को भी निशाना बनाया है। मॉस्को और अन्य शहरों की तेल रिफाइनरियों पर लगातार हमले किए गए हैं। यूक्रेनी ड्रोन हमलों के कारण कई तेल संयंत्रों का कामकाज प्रभावित हुआ और कुछ स्थानों पर ईंधन आपूर्ति बाधित हो गई। अमेरिकी ऊर्जा अनुसंधान संस्थाओं के अनुसार रूस की लगभग एक तिहाई तेल शोधन क्षमता पर असर पड़ा है। रूस जैसे बड़े ऊर्जा उत्पादक देश में पेट्रोल की कमी दिखाई देना अपने आप में असाधारण स्थिति मानी जा रही है। कुछ इलाकों में पेट्रोल की बिक्री सीमित करनी पड़ी जबकि ईंधन निर्यात पहले ही रोका जा चुका है।
सबसे गंभीर स्थिति रूस के कब्जे वाले क्रीमिया क्षेत्र में दिखाई दे रही है। यूक्रेनी ड्रोन हमलों में कर्च शहर के तेल भंडार और क्रास्नोदार क्षेत्र के ईंधन परिवहन केंद्रों को निशाना बनाया गया। इन हमलों में कई लोगों की मौत और दर्जनों के घायल होने की खबर है। क्रीमिया प्रशासन ने आम नागरिकों को पेट्रोल बिक्री रोक दी है और केवल सरकारी सेवाओं को ही ईंधन उपलब्ध कराया जा रहा है। सोशल मीडिया पर लोग पेट्रोल के लिए परेशान नजर आ रहे हैं जबकि कुछ लोग बाजार कीमत से दोगुने दाम पर ईंधन बेचते दिखे।
उधर, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने इन कार्रवाइयों को रूस की ऊर्जा व्यवस्था के खिलाफ लंबी दूरी की रणनीतिक कार्रवाई बताया। उनका कहना है कि रूस केवल ताकत की भाषा समझता है और यूक्रेन अब वही भाषा इस्तेमाल कर रहा है। यूक्रेन का दावा है कि इन हमलों का उद्देश्य रूस की युद्ध क्षमता को कमजोर करना है, क्योंकि तेल और ईंधन से होने वाली कमाई का इस्तेमाल रूस युद्ध संचालन में कर रहा है।
पूर्वी यूक्रेन में रूस की बढ़त
इसके अलावा, जहां एक ओर यूक्रेन रूस के भीतर गहरे हमले कर रहा है, वहीं दूसरी ओर पूर्वी यूक्रेन में रूस की सेना लगातार आगे बढ़ रही है। डोनबास क्षेत्र का महत्वपूर्ण शहर कोस्त्यांतिनिवका इस समय युद्ध का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। यूक्रेनी सैनिकों के अनुसार रूसी सैनिक शहर के भीतर तक घुस चुके हैं और अब उसे चारों तरफ से घेरने की कोशिश कर रहे हैं। यह शहर रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद रूस के लिए क्रामातोर्स्क और स्लोवियांस्क जैसे प्रमुख शहरों तक पहुंच आसान हो जाएगी।
यूक्रेनी ड्रोन संचालकों का कहना है कि शहर अब लगभग धुंधले नियंत्रण क्षेत्र में बदल गया है जहां किसी एक पक्ष का पूरी तरह नियंत्रण नहीं है। रूसी सैनिक इमारतों और पेड़ों का सहारा लेकर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। यूक्रेनी सेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों और सैनिकों की कमी है। कई सैनिकों ने स्वीकार किया कि उन्हें पर्याप्त सहायता नहीं मिल रही और रूसी सेना लगातार दबाव बना रही है।
देखा जाये तो रूस की रणनीति अब केवल सीधे हमले तक सीमित नहीं है। रूसी ड्रोन इकाइयां यूक्रेनी ड्रोन प्रक्षेपण स्थलों को नष्ट करने पर विशेष ध्यान दे रही हैं ताकि यूक्रेन की निगरानी और जवाबी कार्रवाई कमजोर हो सके। यूक्रेनी सैनिकों का कहना है कि यदि उन्होंने अपनी रणनीति नहीं बदली तो रूस धीरे-धीरे और इलाकों पर कब्जा करता जाएगा।
यूक्रेन-पोलैंड के बीच विवाद बढ़ा
उधर, युद्ध का असर केवल सैन्य मोर्चों तक सीमित नहीं है बल्कि राजनीतिक संबंधों पर भी दिखाई दे रहा है। पोलैंड और यूक्रेन के बीच दूसरे विश्व युद्ध से जुड़े ऐतिहासिक मुद्दों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। पोलैंड के राष्ट्रपति कारोळ नावरोत्स्की ने राष्ट्रपति जेलेंस्की से देश का सर्वोच्च सम्मान वापस ले लिया है। इसके विरोध में यूक्रेन के कई पूर्व राष्ट्रपतियों और वरिष्ठ नेताओं ने अपने पोलिश सम्मान लौटा दिए। दरअसल, विवाद उस यूक्रेनी सैन्य इकाई के नाम को लेकर है जिसे ऐसे राष्ट्रवादी संगठन के नाम पर रखा गया जिस पर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पोलिश नागरिकों के नरसंहार का आरोप है।
पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने इस टकराव को दोनों देशों के लिए खतरनाक बताया है। उनका कहना है कि ऐसे विवाद व्यापार, भू राजनीति और दोनों देशों की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचाएंगे। वहीं जेलेंस्की ने कहा कि यूक्रेन और पोलैंड मित्र बने रहेंगे और दोनों देशों के बीच टकराव केवल रूस को फायदा पहुंचाएगा।
बहरहाल, इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि रूस और यूक्रेन का युद्ध अब केवल सीमावर्ती संघर्ष नहीं रह गया है। यूक्रेन ने मॉस्को तक पहुंच कर रूस को चौंका दिया है, जबकि रूस पूर्वी यूक्रेन में अपने सैन्य अभियान को और तेज कर रहा है। ऊर्जा संकट, ड्रोन युद्ध, राजनीतिक तनाव और नागरिकों की बढ़ती परेशानियां इस संघर्ष को और अधिक जटिल बना रही हैं इसलिए अब केवल रूस और यूक्रेन ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया इस युद्ध के अंत का इंतजार कर रही है। हालांकि मौजूदा हालात देखकर ऐसा लगता है कि पुतिन और जेलेंस्की, दोनों ही पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। साथ ही दुनिया के कई देशों की युद्ध आधारित अर्थव्यवस्था और हथियार उद्योग भी इस संघर्ष को जल्दी खत्म होने देने के पक्ष में दिखाई नहीं देते। ऐसे में शांति की उम्मीद फिलहाल दूर ही नजर आ रही है।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)

