जिस तालिबान से लड़ने के लिए अमेरिका और नाटो के देशों ने 20 साल तक जंग लड़ी आज उसी तालिबान का डेलीगेशन यूरोप के दिल ब्रसल्स में उन्हीं देशों के साथ एक मेज पर बैठा होगा। इतिहास ने करवट बदल ली है। ब्रसेल्स में यूरोपी संघ यानी कि इयू और तालिबान के बीच एक ऐसी गुप्त बैठक हुई है जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया। यह मुलाकात सिर्फ हाथ मिलाने तक नहीं थी। यहां शर्तों का एक ऐसा खेल शुरू हुआ जिसमें एक तरफ यूरोप की मदद है तो दूसरी तरफ तालिबान की कट्टरपंथी ने दिया। ब्रसल्स वो जगह है जहां नाटो का मुख्यालय है। वही नाटो जिसके सैनिकों ने अमेरिकी सेना के साथ मिलकर अफगानिस्तान की धरती पर तालिबान को जड़ से उखाड़ने के लिए दो दशक तक युद्ध किया। साल 2021 में अफगानिस्तान से विदेशी सेना की वापसी के करीब 5 साल बाद आज हालात ऐसे हैं कि यूरोप को तालिबान से बात करनी पड़ रही है और इस डेलीगेशन का नेतृत्व तालीबान के विदेश मंत्रालय के अधिकारी कर रहे हैं। ईयू के 15 सदस्य देशों के प्रतिनिधि इस बैठक में शामिल हुए। लेकिन सवाल यह था कि आखिर यूरोप को तालीबान की जरूरत क्यों पड़ गई और तालीबान क्यों यूरोप की दहलीज तक जा पहुंचा?
इन सबके बीच यूरोपीय संघ ने तालीबान के सामने साफ कर दिया कि अगर उन्हें आर्थिक मदद या फिर अंतरराष्ट्रीय मान्यता चाहिए तो उन्हें अपनी कट्टरपंथी इस्लामिक नीतियों को ढीला करना होगा। यूरोप की मुख्य शर्तें किस तरह हैं वो जरा आप ध्यान से सुनिए। तो पहली शर्त है महिलाओं की स्थिति। जी हां, अफगानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा और काम करने की आजादी को बहाल करना होगा। दूसरी शर्त है मानवाधिकार। आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और क्रूर सजाओं पर लगाम लगाई जाए। तीसरा है शरणार्थियों की वापसी। यूरोप में शरण ले चुके अफगान नागरिकों की सुरक्षित वापसी का रास्ता साफ करना होगा। यूरोप को डर है कि अगर अफगानिस्तान में हालात और खराब हुए तो शरणार्थियों का एक बड़ा सैलाब यूरोप की तरफ पड़ जाएगा जिसे संभालना उनके लिए बिल्कुल नामुमकिन सा हो जाएगा।
दरअसल ट्विस्ट यह है कि तालीबान के प्रवक्ता अब्दुल कहर बलखी ने इस बैठक के बाद जो कुछ कहा उसने सबको हैरान कर दिया। तालीबान का साफ कहना है कि वे अब कूटनीतिक संबंधों को सामान्य बनाना चाहते हैं। उनकी सबसे बड़ी शर्त और मांग यह है कि यूरोपी देश काबुल में अपने दूतावास को फिर से खोल दें। तालिबान जानता है कि अगर यूरोप के दूतावास काबुल में खुल जाते हैं तो उन्हें अघोषित मान्यता मिल ही जाएगी और यह नाटो देशों के लिए एक बड़ी दुविधा है। एक तरफ वे मानवाधिकारों की बात करते हैं तो दूसरी तरफ तालिबान उन्हें कूटनीतिक जाल में फंसाने की कोशिश कर रहा है। जहां एक तरफ कूटनीति की बातें हो रही हैं। वहीं नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफ जई ने यूरोप के इस कदम पर तीखा हमला बोला। मलाला जो खुद तालीबान के हमले का शिकार हुई थी। उन्होंने साफ कहा कि यूरोप को उस सत्ता को मान्यता देने जैसा कोई भी कदम नहीं उठाना चाहिए जिसने दुनिया में सबसे क्रूरता के साथ मानवाधिकारों का उल्लंघन किया हो। मलाला का यह बयान यूरोप के उन देशों के लिए भी एक आईना है जो सिर्फ अपने फायदे के लिए तालिबान से हाथ मिलाने के लिए मेज पर बैठ चुके हैं।
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