अरस्तू का मानना था कि राजनीति और नैतिकता एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब राजनीति व्यक्तिगत स्वार्थ या भ्रष्टाचार से ग्रसित हो जाती है, तो समाज का नैतिक पतन होता है, जो लोकतंत्र के मूल उद्देश्य—”सामान्य कल्याण” को कमजोर कर देता है। देश में विपक्षी दलों के सांसदों में मची भगदड़ से अरस्तू का यह कथन आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। सांसदों का एक दल से दूसरे दल में जाना केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है; यह उस गहरी प्रवृत्ति का संकेत है जिसे संस्थागत अवसरवाद कहा जा सकता है। आज दल-बदल अपवाद नहीं रहा, बल्कि एक सामान्यीकृत राजनीतिक व्यवहार बनता जा रहा है, जहाँ जनादेश, विचारधारा और नैतिकता—तीनों क्रमशः हाशिए पर खिसकते प्रतीत होते हैं।
शिवसेना यूबीटी के नौ लोकसभा सांसदों में से छह ने एकनाथ शिंदे गुट का दामन थाम लिया। इन सभी सांसदों ने दिल्ली में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से पहले मुलाकात की और फिर शिवसेना में विलय की घोषणा की। उद्धव ठाकरे की शिवसेना में यह दूसरी बार टूट हुई है। इससे पहले 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में पार्टी दोफाड़ हो गई थी। फिर चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे के गुट को भी मूल शिवसेना का दर्जा मिल गया। तब उद्धव ठाकरे ने अपने गुट का नाम शिवसेना यूबीटी रख लिया।
इससे पहले तृणमूल कांग्रेस के 22 सांसदों ने भी पार्टी तोड़कर एनसीपीआई का दामन थाम लिया था। एनसीपीआई एनडीए की एक बेहद छोटी पार्टी है। शिवसेना यूबीटी में टूट का सीधा फायदा केंद्र में सत्ताधारी एनडीए को मिलने वाला है। इससे एनडीए का संख्या बल और बढ़ जाएगा। माना जा रहा है कि केंद्र सरकार लोकसभा में दो तिहाई बहुमत के जुगाड़ में लगी है ताकि आने वाले दिनों में वह कुछ अहम संविधान संशोधन विधेयकों को पास करवा सके। शिवसेना उद्धव गुट के सांसदों के शिवसेना में शामिल होने के बाद लोकसभा में एनडीए का कुनबा 320 के करीब पहुंच गया है।
सांसदों और विधायकों की ऐसी ही टूटफूट से ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस हाशिए पर आ चुकी है। टीएमसी के 80 विधायकों में से 58 ने ममता से विद्रोह कर दिया था। ममता बनर्जी इस झटके से उबर भी नहीं पाई कि तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने बागी होने की घोषणा कर दी। टीएमसी के पास लोकसभा की 28 सीटें होने के कारण, बागी गुट को दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए कम से कम 19 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता थी। एक ऐसी राजनीतिक पार्टी, जिसकी न लोकसभा और न ही विधनसाभा, कहीं पर भी एक सीट तक नहीं है, उस पार्टी में तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने विलय कर लिया है। इस कदम को दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए अहम माना जा रहा है।
विगत महीनों में गैरभाजपा दलों में विधायकों—सांसदों के विद्रोह की शुरुआत अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से हुई थी। आम आदमी पार्टी के सात राज्य सभा सांसदों ने भाजपा का दामन थाम लिया। इस फैसले के बाद उच्च सदन में आप की ताकत घटकर सिर्फ तीन सांसदों तक रह गई है। राज्यसभा में की ताकत बढ़कर 113 पहुंची वहीं, इस बदलाव से भाजपा को सीधा फायदा हुआ है और उसकी संख्या राज्यसभा में बढ़कर 113 पहुंच गई है। इसके साथ ही एनडीए का आंकड़ा 148 पहुंच गया। वहीं, जिन सात सांसदों का भाजपा में विलय हुआ है, उनमें राघव चड्ढा, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, संदीप पाठक, विक्रमजीत साहनी, स्वाति मालीवाल और राजिंदर गुप्ता शामिल हैं।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या विधायकों का एक गुट खुद विलय की घोषणा कर सकता है, या जिस राजनीतिक दल का वे प्रतिनिधित्व करते हैं, उसे सहमत होना जरूरी है? सुप्रीम कोर्ट को इस मामले पर अभी फैसला लेना है। भारत का दल-बदल विरोधी कानून संविधान की दसवीं अनुसूची के माध्यम से पेश किया गया था। यह 1985 में 52वें संवैधानिक संशोधन के जरिए लागू हुआ। यह ‘आया राम, गया राम’ की राजनीति की घटना की प्रतिक्रिया थी, जिसमें सरकारें गिराने या खुद की उन्नति हासिल करने के लिए विधायक/सांसद मध्यावधि में दल बदल लेते हैं। बता दें कि दसवीं अनुसूची के तहत, कोई भी विधायक जो स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या सदन में अपनी पार्टी के निर्देश के खिलाफ वोट करता है, उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के विधायकों के मामले में अपना निर्णय समाज विज्ञान के सम्मानित प्रोफेसर आंद्रे बेताई के इन शब्दों से शुरू किया था। कोर्ट ने लिखा, ‘हमारे संविधान निर्माताओं ने लोगों को सांविधानिक मूल्यों को बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी है, लेकिन प्रश्न है कि हम अपने इस कर्तव्य को निभाने में कितने सफल हुए? लोकतंत्र और सांविधानिक जिम्मेदारियों को कितना निभा सके?’ कोर्ट ने कहा, मतभेद और दलबदल ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। इन्हें अलग साबित करके ही लोकतांत्रिक मूल्यों को अन्य लोकतांत्रिक विचारों के साथ संतुलित रखा जा सकता है।
कोर्ट ने कहा था कि ‘संसदीय लोकतंत्र में सांविधानिक नैतिकता बरकरार रखने की जिम्मेदारी सरकार और विपक्ष दोनों पर बराबर होती है। भारत में राजनीतिक दल सत्ता में रहने पर अलग और सत्ता से बाहर होने पर अलग ढंग से इस जिम्मेदारी को देखते हैं। यही वजह है कि भारत में जनमानस मानने लगा है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था अनैतिक हो चुकी है। कोर्ट ने कहा, मतभेद और दलबदल ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। इन्हें अलग साबित करके ही लोकतांत्रिक मूल्यों को अन्य लोकतांत्रिक विचारों के साथ संतुलित रखा जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘केवल संविधान की रक्षा और उसकी अक्षुण्णता की शपथ लेना काफी नहीं है। बल्कि सांविधानिक मूल्यों को रोजमर्रा के कामों में शामिल करने की अपेक्षा हमारे महान संविधान ने की है।
आज दल-बदल अपवाद नहीं रहा, बल्कि एक सामान्यीकृत राजनीतिक व्यवहार बनता जा रहा है, जहाँ जनादेश, विचारधारा और नैतिकता—तीनों क्रमशः हाशिए पर खिसकते प्रतीत होते हैं।
यह स्थिति हमें यह पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करती है कि क्या राजनीति अब भी सिद्धांतों और मूल्यों से संचालित है?, या वह केवल सत्ता- समीकरणों का खेल बनकर रह गई है। इस संदर्भ में यह स्वीकार करना होगा कि कानून केवल आंशिक समाधान प्रदान कर सकता है; वास्तविक समाधान राजनीतिक संस्कृति और नैतिकता में निहित है।
पार्टी विद डिफरेंस का जुमला गढ़ने वाली भाजपा भी लोकतंत्र को कमजोर करने वाले दल बदल के खेल में शामिल हो गई। दल बदलने वाले पहले भाजपा को और भाजपा इनको देशद्रोही, भ्रष्टाचारी, मुसलमान समर्थक या मुसलमान विरोधी और न जाने किस किस ढंग से कोसते रहें हैं। दल बदलने के बाद अचानक से दल बदलने वाले और इन्हें लेने वाले पवित्र गाय बन गए। दल बदल कराए बगैर जनाधार बढ़ाना काफी तकलीफदेह होता है। मतलब खुद के बलबूते पर पूर्ण सत्ता प्राप्त करने में बड़ा जोर आता है। इसके लिए जनता से वादे करने पड़ते हैं, उन्हें निभाने के लिए ईमानदारी और पारदर्शिता की जरूरत होती है। ऐसे में यदि दूसरे का पकाया हुआ खाने को मिल जाए तो कौन पीछे रहना चाहेगा। सिद्धान्तों और नैतिकता, ये सब अब किताबी बातें रह गई हैं।
– योगेन्द्र योगी
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