साल 2025 में लागू हुए चार नए श्रम कानून के विरोध में ट्रेड यूनियन ने प्रदर्शन किया है.
किसान संगठनों और देश की 10 बड़ी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने गुरुवार को भारत बंद का ऐलान किया है. ट्रेड यूनियंंस साल 2025 में लागू किए चार नए श्रम कानूनों का विरोध कर रही हैं. बैंक कर्मचारी भी भारत बंद हड़ताल का समर्थन कर रहे हैं. संगठनों ने हफ्ते में 5 दिन काम करने समेत कई मांगों को सामने रखा है.
देश में भारत बंद की हड़ताल कोई नई बात नहीं. कभी ट्रेड यूनियन तो कभी दूसरे संगठन हड़ताल का ऐलान करते हैं. अब सवाल है कि क्या कोई भी संगठन देश में हड़ताल का ऐलान कर सकता है, अगर हिंसा हुई तो इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा? जानिए, क्या कहता है कानून.
क्या कोई भी भारत बंद का ऐलान कर सकता है?
क्या भारत बंद का ऐलान कोई भी कर सकता है? इस पर सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट आशीष पांडे कहते हैं, लोकतांत्रिक देश में सभी को अपनी बात कहने का अधिकार है. भारत के मामले में भी ऐसा ही है. भारतीय संविधान में मिले अधिकार इस पर मुहर लगाते हैं. संविधान का अनुच्छेद (19) (ए) कहता है कि किसी भी भारतीय के पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है.
अनुच्छेद (19) (बी) कहता है कि भारतीय बिना किसी हथियार के शांतिपूर्ण तरीके से कहीं भी इकट्ठा हो सकते हैं. देश में भारत बंद का ऐलान किया जा सकता है. देश में शांतिपूर्ण तरीके से किए गए भारत बंद पर कोई कार्रवाई नहीं होती.
कब होती है कार्रवाई?
भारत बंद अगर शांतिपूर्ण तरीके से किया गया है तो कोई भी कार्रवाई नहीं की जाती. एडवोकेट आशीष पांडे कहते हैं, कार्रवाई तब होती है जब भारत बंद या प्रदर्शन हिंसक रूप लेने लगता है. अगर प्रदर्शनकारी उग्र होकर किसी की प्रॉपर्टी का नुकसान करते हैं, सरकारी सम्पत्ति को डैमेज करते हैं या हड़ताल में शामिल न होने वाले लोगों को डराते या धमकाते हैं, आम नागरिकों के अधिकारों का हनन करते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है. यही नहीं, अगर वो दुकानदारों पर दबाव डालकर दुकान बंद कराते हैं और हिंसक रूप लेते हैं तो कार्रवाई की जा सकती है.
हिंसक प्रदर्शन पर क्या-क्या एक्शन लिया जा सकता है?
भारतीय संविधान में शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति है, उसमें हथियारों को शामिल नहीं किया जा सकता. कार्रवाई हिंसक मामलों में की जाती है. हालांकि, यह भी निर्भर करता है कि हिंसा किस तरह की हुई है और क्या-क्या नुकसान किया गया है.
अगर प्रदर्शनकारी किसी की सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं तो ऐसे मामलों में प्रिवेंशन ऑफ डैमेज ऑफ पब्लिक प्रॉपर्टी एक्ट 1984 के तहत कार्रवाई हो सकती है. जो प्रदर्शनकारी किसी की सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं उन्हें 5 साल की कैद और उसके साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है.
प्रदर्शन में हिंसा के बढ़ते मामलों में देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को बेहतर बनाने के लिए स्वत: संज्ञान लिया था और साल 2007 में इसके लिए कमेटी बनाई थी. पहली थी, जस्टिस थॉमस कमेटी और दूसरी थी नरीमन कमेटी. हालांकि यह पहल बहुत असरदार साबित नहीं हुई. दंगों और प्रदर्शन की संख्या बढ़ने पर सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल बनाने की बात कही, यह पहल भी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंची.
हालांकि इसको लेकर उत्तर प्रदेश सरकार ने कानून बनाया. यह कानून तब बना जब प्रदेश में CAA के खिलाफ प्रदर्शनों का दायरा बढ़ा था. कानून का नाम है, उत्तर प्रदेश कम्पनसेशन फॉर डैमेज टू पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टी एक्ट 2020. इस कानून के मुताबिक, प्रदर्शनकारी किसी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो उसकी भरपाई भी उन्हीं दंगाइयों से होगी. प्रदर्शनकारियों के पास शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन हिंसा और तोड़फोड़ का नहीं.
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