भारत सरकार ने अमेरिका से आयात होने वाले कुछ कृषि उत्पादों, खासकर पलों (pulses) पर 30% का आयात शुल्क (टैरिफ) लगा दिया है, जिससे द्विपक्षीय व्यापार में नई तनाव की स्थिति पैदा हो गई है। यह कदम तब सामने आया है जब भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार सौदे (BTA) पर बातचीत जारी है और कृषि बाजार तक पहुंच एक अहम मुद्दा बना हुआ है। सरकार ने पीले मटर (yellow peas) सहित कुछ अमेरिकी कृषि फसलों पर कुल 30 प्रतिशत का टैरिफ लागू किया है, जिसमें 10% आधार शुल्क और 20% कृषि बुनियादी ढाँचा विकास शुल्क शामिल है। यह शुल्क 1 नवंबर 2025 से प्रभावी हुआ और इसका उद्देश्य घरेलू किसानों की रक्षा, घरेलू बाजार में मूल्य स्थिरता बनाए रखना तथा आयात से सस्ते क्रेश को रोकना बताया गया है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तड़का / दाल (pulses) उपभोक्ताओं और उत्पादकों में से एक है, और लंबे समय से घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कृषि नीतियाँ अपनाता रहा है। पिछले कुछ वर्षों में पलों के आयात में वृद्धि से घरेलू कीमतें गिरने का जोखिम बढ़ गया था, जिससे सरकार ने यह उच्च शुल्क लगाया है ताकि स्थानीय किसानों की आमदनी सुरक्षित रहे और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिले। भारत के इस नए 30% टैरिफ को लेकर अमेरिकी सीनेट के कुछ सांसदों ने चिंता जताई है। उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से आग्रह किया है कि वह भारत से इस उच्च शुल्क को हटाने के लिए वार्ता में जोर दें, क्योंकि इससे अमेरिकी किसानों, खासकर नॉर्थ डकोटा और मोंटाना जैसे पलों-उत्पादक राज्यों के किसानों को प्रतिकूल प्रभाव हो रहा है। अमेरिका के किसानों के प्रतिनिधियों का कहना है कि इस नए शुल्क से अमेरिकी कृषि निर्यात के लिए भारत जैसे बड़े बाजार में प्रतिस्पर्धा कठिन होगी और भारतीय बाजार में अमेरिकी फसलों की मांग कम होने की आशंका है। इसके साथ ही यह मामला भारत–अमेरिका व्यापार समझौता वार्ता में एक संवेदनशील मुद्दा बन गया है, जिससे बातचीत अभी भी लटकी हुई है। भारत सरकार और कुछ व्यापार विशेषज्ञों का तर्क है कि कृषि एक संवेदनशील क्षेत्र है और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के हित में संरक्षण दिया जाना चाहिए। भारत की नीतियाँ अक्सर घरेलू उत्पादकों की रक्षा और आंतरिक बाजार की स्थिरता पर केंद्रित रही हैं, और यह नया टैरिफ इसी सिद्धांत को आगे बढ़ाता है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के शुल्क न केवल अमेरिकी किसानों के लिए कठिनाइयाँ पैदा करेंगे बल्कि व्यापार वार्ता पर भी दबाव बढ़ाएंगे। हालांकि, भारत के दृष्टिकोण से यह कदम स्वदेशी कृषि संरक्षण और घरेलू मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करने की रणनीति का हिस्सा है। विशेषकर पलों, दालों और पीले मटर जैसे फसलों का भारत में निर्यात महंगा हो जाएगा, जिससे निर्यात की मात्रा कम हो सकती है। स्थानीय किसानों को कम आयात प्रतिस्पर्धा मिलने से लाभ हो सकता है, जिससे घरेलू उत्पादन और कीमत स्थिर रहने में मदद मिल सकती है। इस टैरिफ मुद्दे ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौता वार्ता को जटिल बना दिया है, क्योंकि अमेरिका चाहता है कि भारत कृषि बाजार में अधिक खुलापन दे, जबकि भारत अपनी कृषि नीतियों को प्राथमिकता दे रहा है। यह कदम भारत की आर्थिक स्वायत्तता और कृषि संरक्षण की नीति के अनुरूप बताया जा रहा है, लेकिन यह अमेरिका के साथ बढ़ते व्यापार तनाव का एक नया संकेत भी है। दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता लंबे समय से जमी हुई है, विशेष रूप से कृषि और खाद्य उत्पादों को लेकर मतभेद रहे हैं। अब यह देखना बाकी है कि दोनों पक्ष किस प्रकार समाधान ढूंढ़ते हैं ,क्या शुल्क को बातचीत के हिस्से के रूप में संशोधित किया जाएगा, या आगे कोई समझौता विकसित होगा।
रिपोर्ट – अभिनव गुप्ता
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Desk SBN : भारत ने अमेरिका के कृषि आयात पर लगाया 30% शुल्क, व्यापार तनाव बढ़ने के बीच हलचल तेज
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