ICT के फैसले के बाद शेख हसीना के पास सीधे बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार है.
बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (International Crimes Tribunal-ICT) ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को 2024 के छात्र आंदोलन और उससे जुड़े दमन के लिए मानवता के खिलाफ अपराधों में दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई है. यह फैसला उनकी अनुपस्थिति में दिया गया है. वे अगस्त 2024 से ही भारत में शरण लिए हुए हैं.
अब सवाल यह उठता है कि यदि बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट भी शेख हसीना की ICT मौत की सजा की पुष्टि कर देता है, तो क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस फैसले को चुनौती दी जा सकती है? और भारत में शरण लिए होने के संदर्भ में कानूनी कूटनीतिक स्थिति क्या बनती है? आइए, हर पहलू को विस्तार से समझते हैं.
क्या है बांग्लादेश की कानूनी प्रक्रिया?
सबसे पहले यह जान लेते हैं कि बांग्लादेश के कानून के तहत शेख हसीना के पास इस सजा से बचने के कौन-कौन से घरेलू उपाय उपलब्ध हैं. बांग्लादेश के International Crimes Tribunals Act, 1973 की धारा 21 के अनुसार, आईसीटी द्वारा दोष सिद्ध किसी भी व्यक्ति को सीधे बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार है. आमतौर पर इस अपील की समय सीमा 30 से 60 दिन के बीच होती है. कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि अनुपस्थिति में दोषसिद्ध व्यक्ति भी अधिकृत वकीलों के माध्यम से अपील दायर कर सकता है.
बांग्लादेश के राष्ट्रपति के पास संविधान के तहत क्षमादान, सजा घटाने या बदलने का अधिकार (Clemency Power) भी है. इसलिए, आईसीटी के फैसले के बाद पहला और सीधा रास्ता बांग्लादेश की अपनी न्यायिक और संवैधानिक प्रक्रिया के भीतर ही है. अंतरराष्ट्रीय मंच तब प्रासंगिक होते हैं जब घरेलू उपाय निष्प्रभावी साबित हो जाएं.
शेख हसीना को बांग्लादेश में सुनाई गई है मौत की सजा.
क्या बांग्लादेश के फैसले को विश्व स्तर पर चुनौती दी जा सकती है?
जब हम किसी भी मसले को वर्ल्ड लेवल पर चुनौती की बात करते हैं, तो सामान्यतः तीन मंचों की चर्चा होती है.
1- अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC)
शेख हसीना ने अपने बयान में यह चुनौती दी है कि अगर अंतरिम सरकार को सच में न्याय की चिंता है, तो वह उनके खिलाफ आरोपों को हेग स्थित ICC में ले जाए. लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि ICC का काम राष्ट्रीय अदालतों के फैसलों की अपील सुनना नहीं है, वह नए आपराधिक मामलों की जांच और अभियोजन करता है. ICC तभी दखल देता है, जब या तो संबंधित राज्य स्वयं मामला रेफ़र करे या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद उसे रेफ़र करे, या ICC अभियोजक स्वतः संज्ञान लेकर जांच शुरू करें.
यहां सवाल यह नहीं है कि हसीना के खिलाफ नया अंतरराष्ट्रीय मुक़दमा चले, बल्कि यह है कि बांग्लादेश की अदालत का दिया हुआ फैसला सही है या नहीं. ऐसे में यह ICC के अधिकार क्षेत्र के बाहर की बात है. इसलिए, ICC के माध्यम से सीधे सीधे बांग्लादेश की अदालत के फैसले को रद्द कराना या ओवररूल कराना कानूनी रूप से संभव नहीं है.
अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय. फोटो: Nicolas Economou/NurPhoto via Getty Images
2- अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ)
ICJ राज्यों (Countries) के बीच विवाद सुनता है, व्यक्तियों के नहीं. अगर कोई देश यह आरोप लगाए कि बांग्लादेश ने किसी अंतरराष्ट्रीय संधि का उल्लंघन किया है, तो वह ICJ जा सकता है, बशर्ते दोनों देश ICJ के अधिकार क्षेत्र को मानते हों या किसी खास संधि में ICJ को विवाद निवारण का मंच माना गया हो. लेकिन ICJ भी आम तौर पर किसी व्यक्तिगत आपराधिक फैसले को सीधे निरस्त नहीं करता. व्यवहारिक रूप से देखा जाए तो किसी तीसरे देश का बांग्लादेश के खिलाफ ICJ जाना, सिर्फ शेख हसीना के लिए, राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील और कानूनी रूप से जटिल होगा.
इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ). फोटो: ICJ
3- संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार तंत्र
यथार्थ में वर्ल्ड लेवल पर सबसे व्यावहारिक चुनौती यहीं से आ सकती है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त का कार्यालय पहले ही यह कह चुका है कि अपराधों के लिए जवाबदेही ज़रूरी है, लेकिन मौत की सजा पर उसे आपत्ति है और वह हर परिस्थिति में मौत की सजा का विरोध करता है. अनेक रिपोर्ट्स में इसका उल्लेख मिलता है. यूनाइटेड नेशन के विशेष प्रतिवेदक, यथा न्यायाधीशों की स्वतंत्रता, मानवाधिकार और आतंकवाद आदि इस मामले पर अपनी रिपोर्ट दे सकते हैं और बांग्लादेश सरकार से जवाब मांग सकते हैं.
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में सदस्य देश इस मुद्दे को उठा सकते हैं, विशेष सत्र या रिज़ोल्यूशन की मांग कर सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन पहले से ही ICT की निष्पक्षता और मौत की सजा, दोनों पर सवाल उठाते रहे हैं. इनके दबाव से बांग्लादेश पर वैश्विक नैतिक कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है. परंतु यह सब राजनीतिक और नैतिक दबाव है, इन मंचों के पास बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कानूनी रूप से रद्द करने की शक्ति नहीं है.
शेख हसीना, मोहम्मद यूनुस
शेख हसीना की भारत में शरण और प्रत्यर्पण का सवाल
आईसीटी का फैसला आने के बाद अब पूरी दुनिया की निगाहें भारत पर हैं, क्योंकि शेख हसीना वर्तमान में भारत की सरज़मीं पर हैं. सबका मानना है कि भारत पर उन्हें प्रत्यर्पित करने का दबाव बढ़ सकता है. भारत और बांग्लादेश के बीच 2013 का Extradition Treaty लागू है, लेकिन यह संधि भारत को स्वतः बाध्य नहीं करती कि हर स्थिति में वह अभियुक्त को सौंप ही दे. इस संधि की धारा 6 जैसे प्रावधान यह कहते हैं कि अगर आरोप राजनीतिक प्रकृति के हों, तो प्रत्यर्पण से इंकार किया जा सकता है.
धारा 8 जैसे प्रावधानों के तहत अगर प्रत्यर्पण अन्यायपूर्ण या दमनकारी प्रतीत हो, तो भी अनुरोध खारिज किया जा सकता है. ऐसे में भारत दो स्तरों पर तर्क दे सकता है. मुक़दमा राजनीतिक प्रकृति का है, इसलिए प्रत्यर्पण से इंकार किया जा सकता है. दोषसिद्धि के बाद मौत की सजा सुनाई गई है, जबकि भारत ने नीतिगत रूप से मौत की सजा को बहुत सीमित मामलों में लागू रखा है. यदि भारत हसीना को लौटाने से इनकार करता है, तो यह बांग्लादेश की अदालत के फैसले को वर्ल्ड लेवल पर एक तरह की अप्रत्यक्ष चुनौती होगी, क्योंकि भारत यह संकेत देगा कि उसे इस फैसले की निष्पक्षता और न्यायिक मापदंडों पर भरोसा नहीं.
निष्पक्ष मुक़दमे और मौत की सजा पर अंतरराष्ट्रीय मानक
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून में दो सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं. पहला, निष्पक्ष मुक़दमे का अधिकार (Right to Fair Trial) जिसमें स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका, सफ़ाई देने का पूरा अवसर, वकील चुनने की स्वतंत्रता, गवाहों से जिरह, सबूतों की जांच आदि प्रमुख पहलू हैं. अगर यह दिखाया जाए कि इन मानकों का गंभीर उल्लंघन हुआ, तो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के लिए किसी फैसले की वैधता पर सवाल उठाना आसान होता है.
दूसरा, मौत की सजा के प्रति बढ़ती वैश्विक असहमति. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने कई बार रोक की सिफारिश की है. यूरोपियन यूनियन सहित कई क्षेत्रीय समूह मौत की सजा के खिलाफ प्रबल रुख रखते हैं. शेख हसीना के मामले में आलोचक कहते हैं कि उनकी अनुपस्थिति में केस का ट्रायल हुआ. राज्य नियुक्त वकील ने उनकी इच्छा के विपरीत उनका प्रतिनिधित्व किया. आईसीटी की स्थापना और संरचना पर पहले भी राजनीतिक पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे तथ्यों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह दलील दी जा सकती है कि यह फैसला ड्यू प्रॉसेस के अनुरूप नहीं लिया गया है इसलिए इसकी वैधता संदिग्ध है.
कानूनी दृष्टि से देखें तो बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले को विश्व स्तर पर किसी एक केंद्रीय अंतरराष्ट्रीय अदालत में अपील संभव नहीं है. ICC और ICJ जैसे मंच इस तरह के राष्ट्रीय आपराधिक निर्णयों की नियमित अपीली अदालत नहीं हैं. फिर भी, शेख हसीना के मामले में अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीति की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहेगी. संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन और विभिन्न देश बांग्लादेश पर निष्पक्ष मुक़दमे और मौत की सजा खत्म करने के लिए दबाव डाल सकते हैं.
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