सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, पुलिस को गिरफ्तारी की वजह की लिखित सूचना देनी अनिवार्य है.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में स्पष्ट किया है कि जब भी किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है, तो पुलिस को गिरफ्तारी के आधार की लिखित सूचना देना अनिवार्य है. साथ ही, गिरफ्तार व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह इस सूचना की एक प्रति अपने परिवार के सदस्य या मित्र को भी दे सके. सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा है कि लिखित सूचना की भाषा ऐसी हो जो गिरफ्तार व्यक्ति समझ सके.
यह फैसला नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि अक्सर देखा गया है कि पुलिस बिना उचित कारण बताए या बिना लिखित सूचना दिए लोगों को गिरफ्तार कर लेती है, जिससे उनके मौलिक अधिकारों का हनन होता है. बीते छह नवंबर को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ए. जार्ज मसीह की बेंच ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. सर्वोच्च अदालत ने इस आदेश की कॉपी सभी मुख्य सचिवों को भेजने के आदेश दिए हैं, जिससे वे अपने स्तर से इस आदेश का अनुपालन करने के लिए जरूरी कार्यवाही कर सकें.
आइए, इस आदेश के बहाने समझने का प्रयास करते हैं कि अभी तक भारत में गिरफ़्तारी के नियम-कानून क्या हैं? इस मुद्दे पर कानून, भारतीय संविधान क्या कहता है?
भारतीय कानून में गिरफ्तारी के नियम
भारत में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान और कानूनों में कई प्रावधान किए गए हैं. इनमें से एक महत्वपूर्ण अधिकार है, गिरफ्तारी के समय व्यक्ति को उसके अधिकारों और गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देना. भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 41 से 60A तक गिरफ्तारी से संबंधित विस्तृत प्रावधान दिए गए हैं.
ऐसा ही भारत सरकार की ओर से पास और पिछले साल से देश में लागू नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में भी व्यवस्था है. ध्यान रहे, पुराने मामलों में अभी भी भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता के तहत और नया कानून लागू होने के बाद नए नियमों के तहत कार्यवाही का प्रावधान है. इन प्रावधानों के अनुसार, पुलिस को गिरफ्तारी के समय निम्नलिखित नियमों का पालन करना अनिवार्य है-
- गिरफ्तारी का कारण बताना: पुलिस को गिरफ्तार किए जा रहे व्यक्ति को स्पष्ट रूप से बताना होगा कि उसे किस अपराध के लिए गिरफ्तार किया जा रहा है.
- गिरफ्तारी की सूचना: गिरफ्तार व्यक्ति के परिवार या मित्र को गिरफ्तारी की सूचना देना अनिवार्य है.
- गिरफ्तारी मेमो: गिरफ्तारी के समय एक मेमो तैयार किया जाता है, जिसमें गिरफ्तारी का समय, स्थान और कारण दर्ज होता है. इस पर गिरफ्तार व्यक्ति और एक स्वतंत्र गवाह के हस्ताक्षर कराने के भी नियम हैं.
- मेडिकल जांच: गिरफ्तार व्यक्ति की मेडिकल जांच कराना अनिवार्य है, ताकि किसी भी प्रकार की शारीरिक चोट या उत्पीड़न की जानकारी मिल सके.
- 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी: गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना कानूनन अनिवार्य है.
अनुच्छेद 22(1) क्या है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(1) नागरिकों को गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान कुछ विशेष अधिकार प्रदान करता है. इसके मुताबिक किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को जल्द से जल्द उसकी गिरफ्तारी के कारणों की सूचना दी जानी चाहिए. गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से परामर्श करने और उसकी सहायता लेने का अधिकार है. गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है, ताकि उसकी हिरासत की वैधता की जांच हो सके. यह अनुच्छेद नागरिकों को मनमानी गिरफ्तारी और हिरासत से बचाने के लिए बनाया गया है.
सुप्रीम कोर्ट
क्या कहते हैं कानून के विशेषज्ञ?
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्विनी कुमार दुबे कहते हैं कि हाल में आए सर्वोच्च अदालत के फैसले ने संवैधानिक आदेश को और मजबूत किया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि गिरफ्तारी के आधार की लिखित सूचना एक “प्रक्रियात्मक औपचारिकता” नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता की एक “मौलिक सुरक्षा” है. सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों (और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 50 / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 47 के तहत) के अनुसार पुलिस को गिरफ्तारी के दौरान पुलिस अधिकारी को गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों की लिखित सूचना देनी होगी.
यदि आपात स्थिति में तुरंत लिखित आधार नहीं दिए जा सकते, तो रिमांड के लिए मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से कम से कम दो घंटे पहले उन्हें लिखित में उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा.
कानून यह भी कहता है कि गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी की स्पष्ट पहचान होनी चाहिए और गिरफ्तारी का एक मेमो तैयार किया जाना चाहिए. इस मेमो पर कम से कम एक निष्पक्ष गवाह और गिरफ्तार व्यक्ति के हस्ताक्षर जरूरी हैं. इन नियमों का पालन न करने पर न केवल गिरफ्तारी और रिमांड अवैध हो सकती है, बल्कि संबंधित पुलिस अधिकारियों पर भी कार्रवाई भी संभव है.

पुलिस को कौन-कौन से नियमों का पालन करना जरूरी?
सुप्रीम कोर्ट और भारतीय कानून के अनुसार, पुलिस को गिरफ्तारी के समय कुछ आधारभूत नियमों का पालन करना अनिवार्य है. लिखित सूचना देना, परिवार को जानकारी देना, गिरफ़्तारी मेमो के साथ ही हर 48 घंटे में मेडिकल जांच जरूरी है. किसी भी जुर्म में गिरफ्तार व्यक्ति की मेडिकल जांच मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पहले भी कराए जाने का नियम है.
हर 48 घंटे में मेडिकल जांच तब जरूरी बताया गया है, जब गिरफ्तार व्यक्ति पुलिस रिमांड पर हो. कई बार गंभीर अपराधों की विवेचना में मदद के लिए पुलिस गिरफ्तार व्यक्ति को रिमांड पर लेती है. यह कई बार एक-दो दिन का होता है तो कई बार ज्यादा समय के लिए. गिरफ्तार व्यक्ति के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना और उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न करना भी पुलिस के लिए अनिवार्य बताया गया है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का महत्व
यह फैसला भारतीय लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए मील का पत्थर है. इससे पुलिस की मनमानी पर अंकुश लगेगा और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा होगी. साथ ही, यह फैसला पुलिस प्रशासन को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाएगा. इससे न केवल गिरफ्तार व्यक्ति, बल्कि पूरे समाज में कानून के प्रति विश्वास बढ़ेगा. भारतीय संविधान और कानून में पहले से ही गिरफ्तारी के समय व्यक्ति को उसके अधिकारों की जानकारी देने का प्रावधान है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ताजे फैसले ने इसे और अधिक स्पष्ट और प्रभावी बना दिया है. बस शर्त यह है कि पुलिस सुप्रीम कोर्ट के ताजे आदेश के आलोक में गिरफ़्तारी के नियम-कानूनों का पालन करे.
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