मध्य पूर्व में जंग अब और खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है। यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के एयरपोर्ट और तेल ठिकानों पर हमले तेज कर दिए हैं। रियाद में मिसाइलों के धमाके गूंज रहे हैं, तेल कंपनी अरामको के ठिकानों पर आग लग रही है और सऊदी अरब की सुरक्षा को खुली चुनौती मिल रही है। वहीं अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी हूतियों पर हमले की तैयारी में हैं। ऐसे में यह लड़ाई सिर्फ सऊदी अरब और यमन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि पूरी दुनिया की तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार और मध्य पूर्व की स्थिरता पर बड़ा खतरा बनकर मंडरा रही है।
अरामको से एयरपोर्ट तक, सऊदी के रणनीतिक ठिकाने निशाने पर
हम आपको बता दें कि हूतियों ने अपने ताजा बयान में दावा किया है कि उन्होंने धहरान स्थित सऊदी अरामको के प्रतिष्ठानों, रियाद एयरपोर्ट और राजधानी में मौजूद अरामको की रिफाइनरी को बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज मिसाइलों और ड्रोन से निशाना बनाया। मंगलवार रात धहरान में अरामको के मुख्य परिसर पर हुए हमले के बाद आग लगने की खबर सामने आई थी। सूत्रों के मुताबिक, आग कई मंजिलों तक फैल गई थी। हालांकि सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने नुकसान को सीमित बताया। सूत्रों के अनुसार, अरामको का कामकाज सामान्य रूप से जारी रहा और कर्मचारियों को घर से काम करने को कहा गया है।
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इसके अलावा, हूतियों ने अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों, नागरिकों और कर्मचारियों से सऊदी हवाई अड्डों तथा तेल प्रतिष्ठानों को खाली करने की अपील भी की है। यह सऊदी अर्थव्यवस्था की सबसे संवेदनशील नस पर दबाव बनाने की रणनीति है। साथ ही रियाद का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा कई बार हमलों का सामना कर चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक, इसे 17 अक्टूबर तक बंद किया गया है और सऊदी अरब के लिए कई उड़ानें रद्द कर दी गई हैं। इस घटनाक्रम ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की उन महत्वाकांक्षी योजनाओं को भी झटका दिया है, जिनके जरिए वे सऊदी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालकर विविध क्षेत्रों में विस्तार देना चाहते हैं।
ईरान का मोहरा या अपने हितों की लड़ाई लड़ रहे हूती?
हम आपको बता दें कि हूतियों को लंबे समय से ईरान का सहयोगी और सऊदी अरब के खिलाफ तेहरान का प्रतिनिधि माना जाता रहा है। लेकिन मौजूदा संघर्ष की एक अहम परत यह है कि हूती नेतृत्व अपनी लड़ाई को ईरान के निर्देश पर चलने वाले अभियान के बजाय यमन की संप्रभुता और सऊदी हमलों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के रूप में पेश कर रहा है। देखा जाये तो हूती आंदोलन की जड़ें यमन के घरेलू संघर्षों में हैं। हूती देश के लगभग एक-तिहाई भूभाग और करीब दो-तिहाई आबादी पर नियंत्रण रखते हैं। उनके पास आधुनिक युद्धक विमान नहीं हैं, लेकिन लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों और ड्रोन का प्रभावशाली जखीरा है।
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले शुरू होने के बाद हूतियों के तत्काल युद्ध में कूदने की आशंका थी, लेकिन उन्होंने कई महीनों तक दूरी बनाए रखी। जुलाई में बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य बंद करने के लिए ईरान की ओर से कथित अपील की खबरों के बावजूद उन्होंने तत्काल वैसा कदम नहीं उठाया। इसकी वजह अरब राष्ट्रवाद, यमनी पहचान और ईरान के लिए लड़ने की राजनीतिक संवेदनशीलता भी मानी जाती है। अगस्त में क्षेत्रीय संघर्ष में उनकी वापसी के साथ ही सऊदी अरब के खिलाफ उनकी बयानबाजी और सैन्य गतिविधियां तेज हो गईं।
सना एयरपोर्ट से शुरू हुआ बदले का नया चक्र
इस टकराव की पृष्ठभूमि में सना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का विवाद भी अहम है। हूती-नियंत्रित राजधानी का यह हवाई अड्डा 2024 के आखिर में इजरायली हमलों के बाद बंद था। जुलाई 2026 में तेहरान से आने वाली एक उड़ान के जरिए इसे दोबारा खोलने की कोशिश हुई। इसी दौरान 13 जुलाई को सऊदी सेना ने रनवे पर बमबारी की, जिससे हूतियों को रियाद के खिलाफ जवाबी कार्रवाई का नया आधार मिला। हम आपको याद दिला दें कि सऊदी अरब ने 2015 में यमन के गृहयुद्ध में हस्तक्षेप किया था, जब हूतियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से 2022 में हुआ संघर्षविराम कई वर्षों तक नाजुक शांति बनाए रखने में सफल रहा, लेकिन इस साल लड़ाई फिर भड़क गई। सऊदी अरब अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त यमनी सरकार के समर्थन में सैन्य अभियान चला रहा है, जबकि हूती इसे अपने खिलाफ आक्रामकता बताते हैं। साथ ही हूतियों की रणनीति का एक उद्देश्य सना में आर्थिक संकट और नाकेबंदी के लिए सऊदी अरब को जिम्मेदार ठहराना भी है। हालांकि उनके शासन, कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार पर उठते सवाल इस दावे को जटिल बनाते हैं।
बाब अल-मंदेब पर पकड़, दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव
हम आपको यह भी याद दिला दें कि सितंबर की शुरुआत में बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर प्रभाव बढ़ाने की हूतियों की कोशिशों ने संकट को और गंभीर बना दिया था। लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाला यह समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यहां जहाजरानी बाधित होने का असर सऊदी तेल निर्यात से लेकर अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं तक पहुंच सकता है। यहां यह भी ध्यान देने की बात है कि हूतियों ने पहले गाजा युद्ध के दौरान नवंबर 2023 से मई 2025 तक लाल सागर में जहाजों को निशाना बनाकर अपनी क्षमता दिखाई थी। अक्टूबर 2025 में गाजा संघर्षविराम के बाद उन्होंने इजरायल से जुड़े जहाजों पर हमले रोक दिए थे। मई 2025 में ट्रंप प्रशासन के साथ समझौते के बाद अमेरिकी जहाजों पर हमले भी निलंबित किए गए थे। सितंबर 2026 में ओमान में अमेरिकी राजनयिकों और हूती प्रतिनिधियों के बीच कथित मुलाकातों की खबरें भी सामने आईं थी। इससे संकेत मिलता है कि आक्रामक बयानबाजी के बावजूद हूती नेतृत्व परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बदलता रहा है।
ट्रंप की चेतावनी और यमन में मानवीय त्रासदी
इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हूतियों के खिलाफ हमलों में शामिल होने पर विचार कर रहे हैं। दूसरी ओर हूतियों ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ने हमला किया तो वे पूरे मध्य पूर्व में अमेरिकी कर्मियों और हितों को निशाना बना सकते हैं। ऐसा हुआ तो वाशिंगटन क्षेत्रीय युद्ध में और गहराई तक खिंच सकता है।
उधर, यमन में आम नागरिकों की स्थिति बदतर होती जा रही है। रेड क्रॉस के मुताबिक, कई मोर्चों पर लड़ाई तेज होने से अस्पतालों पर घायलों का दबाव बढ़ गया है। संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम ने चेतावनी दी है कि सरकारी नियंत्रण वाले ताइज शहर तक जीवनरक्षक सहायता पहुंचना बंद हो गया है। हूतियों से घिरे इस शहर में छह लाख से अधिक लोग मानवीय सहायता पर निर्भर हैं, जिनमें दो लाख से ज्यादा महिलाएं और बच्चे शामिल हैं।
बहरहाल, सऊदी अरब और हूतियों के बीच यह टकराव अब सिर्फ मिसाइलों और जवाबी हमलों की कहानी नहीं रहा। इसके केंद्र में तेल, समुद्री व्यापार, क्षेत्रीय वर्चस्व और अमेरिका की संभावित सैन्य भूमिका है। लेकिन इस भू-राजनीतिक संघर्ष की सबसे भारी कीमत यमन की वह आबादी चुका रही है, जो एक दशक से अधिक समय से युद्ध, भुखमरी और तबाह बुनियादी ढांचे के बीच जिंदगी बचाने की जद्दोजहद कर रही है।

