इजराइल में आज हो रहे संसदीय चुनाव में जनता सिर्फ अपने देश के भाग्य का फैसला नहीं कर रही, बल्कि उसके वोट का असर ईरान के भविष्य और पूरे मध्य-पूर्व की शांति पर भी पड़ेगा। हम आपको बता दें कि इस प्रकार की रिपोर्टें हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मध्यावधि चुनावों के बाद और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू संसदीय चुनावों के बाद ईरान पर हमलों के दूसरे दौर की तैयारी में हैं। ऐसे में इजराइल का यह चुनाव युद्ध और शांति के बीच खड़े मध्य-पूर्व का भविष्य तय करने वाला चुनाव बन गया है। नेतन्याहू की सत्ता में वापसी ईरान और हमास के खिलाफ नए सैन्य टकराव को जन्म दे सकती है, जबकि सत्ता परिवर्तन से रणनीति में बदलाव की गुंजाइश पैदा हो सकती है। इसलिए इजराइल में वोट सिर्फ सरकार चुनने के लिए नहीं पड़ रहे बल्कि उसके परिणाम यह भी तय करेंगे कि ईरान पर फिर बम बरसेंगे या नहीं। साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस चुनाव का महत्व इसलिए भी है कि नेतन्याहू की जीत या हार से अमेरिका-इजराइल संबंधों, अरब देशों के साथ संभावित समझौतों और फिलिस्तीन के प्रश्न पर कूटनीतिक गुंजाइश प्रभावित हो सकती है।
जहां तक चुनावी रुझानों की बात है तो आपको बता दें कि इजराइल के अखबार द टाइम्स ऑफ इजराइल, हारेत्ज़ और द जेरूसलम पोस्ट के चुनाव-पूर्व विश्लेषणों में एक बात प्रमुखता से उभरी है कि नेतन्याहू के समर्थक और उनके विरोधी दो स्पष्ट राजनीतिक खेमों में बंटे हुए हैं। एक ओर नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उसके दक्षिणपंथी सहयोगी हैं, तो दूसरी ओर पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन है। मतदान से पहले आए सर्वेक्षणों में किसी भी खेमे को 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटों का स्पष्ट बहुमत मिलता दिखाई नहीं दिया। द टाइम्स ऑफ इजराइल के अंतिम सर्वेक्षण में दोनों प्रमुख खेमों को लगभग 51-51 सीटें मिलने का अनुमान था। माना जा रहा है कि इजराइल में भी छोटे दल किंगमेकर बन कर उभर सकते हैं।
हम आपको बता दें कि इजराइल में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री नहीं चुनते, बल्कि संसद के लिए दलों को वोट देते हैं। इसलिए सबसे अधिक सीटें जीतना भी अपने आप में सरकार बनाने की गारंटी नहीं है। असली मुकाबला चुनाव के बाद गठबंधन बनाने का होगा।
दूसरी ओर, नेतन्याहू की सबसे बड़ी ताकत उनकी सुरक्षा संबंधी छवि रही है। वह लंबे समय से ईरान को इजराइल के अस्तित्व के लिए खतरा बताते आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन भी उनके चुनाव प्रचार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। लेकिन यही सुरक्षा का मुद्दा अब उनके लिए राजनीतिक चुनौती बन गया है। विपक्ष का आरोप है कि नेतन्याहू 7 अक्टूबर के हमले को रोकने में हुई नाकामी की जिम्मेदारी से बचते रहे हैं। विपक्षी खेमे ने सुरक्षा संबंधी विफलताओं की स्वतंत्र जांच और जवाबदेही की मांग उठाई है। इसके अलावा अति-रूढ़िवादी यहूदियों को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट देने का विवाद और न्यायपालिका की शक्तियों में कटौती की कोशिशें भी चुनावी बहस के केंद्र में हैं।
साथ ही यह भी माना जा रहा है कि यदि नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत जुटाने में विफल रहता है, तो उनके लंबे राजनीतिक कॅरियर पर गंभीर संकट आ सकता है। हालांकि, यदि विपक्ष भी पर्याप्त समर्थन नहीं जुटा पाया, तो गठबंधन सरकार, अल्पमत सरकार या नए चुनाव जैसी संभावनाएं सामने आ सकती हैं।
दूसरी ओर, अमेरिका में इस चुनाव को लेकर सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत ट्रंप का नेतन्याहू के पक्ष में समर्थन है। वाशिंगटन के लिए इजराइल केवल सहयोगी देश नहीं, बल्कि मध्य-पूर्व की सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा है। लेकिन नेतन्याहू के साथ करीबी संबंधों के बावजूद अमेरिका के सामने यह चुनौती भी है कि वह क्षेत्रीय युद्ध को व्यापक संघर्ष में बदलने से कैसे रोके।
इसके अलावा, इस चुनाव का सबसे संवेदनशील पहलू ईरान है। द जेरूसलम पोस्ट ने चुनाव से पहले प्रकाशित अपने विश्लेषण में ईरान के खतरे और नेतन्याहू के नेतृत्व पर जनता के भरोसे को चुनावी बहस के प्रमुख मुद्दों में रखा। वहीं एक अन्य विश्लेषण के मुताबिक, नेतन्याहू के विरोधियों की जीत भी ईरान के प्रति इजराइल की मूल सुरक्षा नीति में तत्काल और बुनियादी बदलाव की गारंटी नहीं होगी। माना जा रहा है कि नेतन्याहू दोबारा सत्ता में आते हैं, तो दक्षिणपंथी सहयोगियों के दबाव में ईरान के खिलाफ अधिक आक्रामक नीति अपनाने की आशंका बढ़ सकती है। इसके विपरीत, विपक्षी सरकार अमेरिका और क्षेत्रीय शक्तियों के साथ समन्वय तथा कूटनीतिक विकल्पों को अधिक महत्व देने की कोशिश कर सकती है।
वहीं ईरान के लिए भी इजराइल का परिणाम महत्वपूर्ण होगा। नेतन्याहू की मजबूती तेहरान पर सैन्य और कूटनीतिक दबाव बढ़ा सकती है, जबकि इजराइल में राजनीतिक अनिश्चितता ईरान को रणनीतिक अवसर दे सकती है। हम आपको यह भी बता दें कि रिपोर्टों के मुताबिक, गाजा, ईरान और कई अन्य मुस्लिम देशों में नेतन्याहू की हार के लिए दुआएं मांगी जा रही हैं। दरअसल, नेतन्याहू की राजनीति और सैन्य कार्रवाइयों को लेकर इस्लामिक देशों में गहरा आक्रोश है और उनकी सत्ता से विदाई को मध्य-पूर्व की मौजूदा परिस्थितियों में बदलाव की उम्मीद के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसे में इजराइल के इस चुनाव पर सिर्फ वहां के नागरिकों की ही नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों की भी निगाहें टिकी हैं, जो नेतन्याहू की हार चाहते हैं। अब देखना यह है कि गाजा और ईरान समेत तमाम मुस्लिम देशों में मांगी जा रही दुआएं कबूल होती हैं या नेतन्याहू एक बार फिर चुनावी बाजी जीतकर अपने विरोधियों की उम्मीदों पर पानी फेर देते हैं।
बहरहाल, इजराइल के इस चुनाव में असली मुकाबला केवल नेतन्याहू और आइजेनकोट के बीच नहीं है। यह सुरक्षा के नाम पर निरंतर सैन्य कार्रवाई और जवाबदेह नेतृत्व की मांग के बीच भी संघर्ष है। नेतन्याहू जीतते हैं, तो इसे उनकी राजनीतिक वापसी और सुरक्षा नीति के समर्थन के रूप में देखा जाएगा। यदि विपक्ष बहुमत जुटाता है, तो यह जवाबदेही और राजनीतिक बदलाव का संकेत होगा। लेकिन दोनों ही स्थितियों में ईरान, गाजा और मध्य-पूर्व की अस्थिरता इजराइल की अगली सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा बनी रहेगी।

