एक ओर मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू भारत से 3,000 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता का लाभ ले रहे हैं, तो दूसरी ओर पाकिस्तान पहुंचकर रक्षा और समुद्री सहयोग सहित 20 समझौतों पर हस्ताक्षर कर रहे हैं। जिस भारत ने आर्थिक संकट के समय मालदीव को सहारा दिया, उसकी उदारता का लाभ उठाकर इस द्वीपीय देश के राष्ट्रपति अब पाकिस्तान के साथ सामरिक रिश्ते मजबूत करने में जुटे हैं। यह महज कूटनीतिक सक्रियता नहीं, बल्कि भारत के लिए एक गंभीर रणनीतिक सवाल है कि क्या उसका पड़ोसी उसकी आर्थिक सहायता को अपना अधिकार और उसके सामरिक हितों की अनदेखी को अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता समझने लगा है?
देखा जाये तो मुइज्जू की पाकिस्तान यात्रा ने भारत की इसी चिंता को हवा दी है। एक दशक से अधिक समय बाद मालदीव का कोई राष्ट्रपति पाकिस्तान गया है। तीन दिवसीय इस यात्रा के दौरान पाकिस्तान के सेना प्रमुख और चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ उनकी मुलाकात और रक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमति विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए 20 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं। सवाल यह है कि इन समझौतों का वास्तविक स्वरूप क्या होगा, इनके क्रियान्वयन की दिशा क्या होगी और हिंद महासागर में इनका इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा? इन सवालों के जवाब सामने आना अभी बाकी है, लेकिन भारत के लिए सतर्क होने की वजहें स्पष्ट हैं।
देखा जाये तो मालदीव कोई साधारण भौगोलिक इकाई नहीं है। हिंद महासागर में उसकी स्थिति उसे समुद्री व्यापार मार्गों, नौवहन की सुरक्षा और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है। भारत की समुद्री सुरक्षा का सीधा संबंध इस क्षेत्र में स्थिरता से है। मालदीव के साथ भारत के संबंध इसलिए भी अहम हैं, क्योंकि दोनों देशों के बीच समुद्री निगरानी, रक्षा प्रशिक्षण, आपदा प्रबंधन और सुरक्षा सहयोग का लंबा इतिहास रहा है। ऐसे में यदि पाकिस्तान इस रिश्ते में रक्षा और समुद्री सहयोग के माध्यम से अपनी जगह बनाने की कोशिश करता है, तो भारत को केवल द्विपक्षीय समझौतों की सूची नहीं, बल्कि उनके दीर्घकालीन सामरिक परिणामों पर भी नजर रखनी होगी।
दूसरी ओर, पाकिस्तान की अपनी सीमाएं हैं। आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा पाकिस्तान मालदीव को भारत जैसी व्यापक आर्थिक सहायता देने की स्थिति में नहीं दिखता। फिर भी इस्लामाबाद के लिए माले के साथ बढ़ती नजदीकी का महत्व आर्थिक लाभ से कहीं अधिक कूटनीतिक और रणनीतिक हो सकता है। भारत के निकटवर्ती समुद्री क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने, दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका को चुनौती देने और क्षेत्रीय मंचों पर अपने लिए समर्थन जुटाने की उसकी कोशिशों को इसी संदर्भ में देखना चाहिए।
साथ ही मुइज्जू का पाकिस्तान में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के शिखर सम्मेलन को जल्द बुलाने का आह्वान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने कहा कि मालदीव सदस्य देशों से परामर्श कर सार्क की गतिविधियां दोबारा शुरू कराने के लिए तैयार है। सुनने में यह क्षेत्रीय सहयोग की सकारात्मक पहल लग सकती है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वर्ष 2016 में इस्लामाबाद में प्रस्तावित सार्क शिखर सम्मेलन जम्मू-कश्मीर के उरी में हुए आतंकी हमले के बाद रद्द हो गया था। भारत का स्पष्ट रुख रहा है कि आतंकवाद और क्षेत्रीय सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते। पाकिस्तान को पहले ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें आतंकवाद से मुक्त होकर सार्थक सहयोग संभव हो।
ऐसे में मुइज्जू का पाकिस्तान की धरती से सार्क सम्मेलन बहाल करने की पैरवी करना भारत के लिए असहज करने वाला है। इससे पहले भी वह भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत आगे बढ़ाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने की पेशकश कर चुके हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या दक्षिण एशिया की समस्याओं का समाधान आतंकवाद पर पाकिस्तान की जवाबदेही तय किए बिना हो सकता है? क्या क्षेत्रीय सहयोग के नाम पर उस बुनियादी समस्या को किनारे रखा जा सकता है, जिसने सार्क को वर्षों से निष्क्रिय बना रखा है? भारत के लिए यह स्वीकार करना कठिन होगा कि आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई के बिना पाकिस्तान को क्षेत्रीय कूटनीति के केंद्र में वापस लाने की कोशिश की जाए।
हैरानी की बात यह भी है कि इसी दौरान भारत ने मालदीव की आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए 30 अरब रुपये की मुद्रा अदला-बदली सुविधा को आगे बढ़ाने की मंजूरी दी है। अप्रैल में दी गई इस राशि की सुविधा के तहत भारतीय रुपये तक पहुंच मालदीव को तरलता संबंधी दबाव से निपटने में मदद करती है। भारत 2012 से अब तक मालदीव को 1.1 अरब डॉलर से अधिक की मुद्रा अदला-बदली सहायता भी दे चुका है। इसके अलावा भारतीय निवेश से मालदीव के सरकारी ऋण-पत्रों को समर्थन मिला है। मालदीव की विदेश मंत्री ने इस फैसले के लिए भारत के प्रति आभार जताया और इसे दोनों देशों की पुरानी मित्रता का प्रमाण बताया है।
देखा जाये तो भारत की सहायता को कमजोरी समझना मुइज्जू की सबसे बड़ी भूल होगी। भारत का सहयोग किसी राजनीतिक दल या राष्ट्रपति पर एहसान नहीं, बल्कि पड़ोस में स्थिरता, समृद्धि और साझा सुरक्षा सुनिश्चित करने की दीर्घकालीन नीति का हिस्सा है। लेकिन मित्रता का अर्थ सामरिक हितों के प्रति उदासीनता भी नहीं होता। आर्थिक सहायता और रक्षा सहयोग दो अलग-अलग विषय हैं, फिर भी जब कोई देश एक ओर भारत से वित्तीय सहारा ले और दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ संवेदनशील क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाए, तो नई दिल्ली को अपने हितों की रक्षा के लिए स्पष्ट कूटनीतिक संदेश देना चाहिए।
समय की मांग यही है कि भारत को मालदीव के साथ संवाद बनाए रखते हुए इन 20 समझौतों के वास्तविक क्रियान्वयन, रक्षा प्रशिक्षण, समुद्री सूचनाओं के आदान-प्रदान और संभावित सुरक्षा प्रभावों पर करीबी नजर रखनी चाहिए। साथ ही मालदीव को यह समझाना होगा कि हिंद महासागर में स्थिरता किसी तीसरे देश के विरुद्ध खेमेबंदी से नहीं, बल्कि पारदर्शी और भरोसेमंद सहयोग से मजबूत होती है। मुइज्जू को तय करना होगा कि उनकी विदेश नीति का आधार दीर्घकालीन राष्ट्रीय हित हैं या भारत-विरोधी संतुलन साधने की राजनीतिक कवायद। मालदीव की भौगोलिक स्थिति उसे रणनीतिक महत्व देती है, लेकिन यही स्थिति उसे बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा का मैदान भी बना सकती है। पाकिस्तान के साथ समझौते करना मालदीव का संप्रभु निर्णय है; मगर उन समझौतों के वास्तविक परिणामों को लेकर भारत की चिंता भी उतनी ही जायज है।
बहरहाल, हिंद महासागर में भारत अपनी सुरक्षा को लेकर कोई जोखिम नहीं उठा सकता। मित्रता का हाथ बढ़ाना उसकी ताकत है, लेकिन उस ताकत का अर्थ यह नहीं कि उसके सामरिक हितों की अनदेखी की जाए और वह चुपचाप तमाशा देखता रहे। मुइज्जू की पाकिस्तान यात्रा ने नई दिल्ली के सामने एक स्पष्ट चुनौती रख दी है। यह चुनौती है पड़ोसियों की आर्थिक मदद जारी रखते हुए यह सुनिश्चित करना कि भारत की उदारता उसके अपने सामरिक हितों के विरुद्ध इस्तेमाल न होने पाए।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)

