संयुक्त राष्ट्र की परमाणु एजेंसी के प्रमुख ने बताया कि इस बात के कोई संकेत नहीं मिले हैं कि ईरान ने इस साल या पिछले साल अमेरिका एवं इजराइल के सैन्य हमलों में क्षतिग्रस्त हुए अपने परमाणु केंद्रों की मरम्मत करने या उनका पुनर्निर्माण करने की कोई कोशिश की है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि 28 फरवरी को ईरान के साथ युद्ध शुरू करने का एक प्रमुख कारण उसे परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना था। हालांकि, वह यह भी दावा करते रहे हैं कि इससे पहले जून 2025 में ईरान के परमाणु केंद्रों पर किए गए अमेरिकी हमलों ने देश के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह तबाह कर दिया था।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के प्रमुख राफेल ग्रॉसी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में ईरान से आग्रह किया कि वह निरीक्षकों को सैन्य हमलों में क्षतिग्रस्त हुए केंद्रों समेत अपने सभी परमाणु केंद्रों का निरीक्षण करने की अनुमति दे। पिछले साल अमेरिका के हमलों के बाद से आईएईए ईरान के पास मौजूद उस यूरेनियम भंडार की स्थिति की पुष्टि नहीं कर सकी है जिसे परमाणु हथियार बनाने के लिए आवश्यक स्तर तक संवर्धित किया गया है। ग्रॉसी ने हालांकि, कहा, ‘‘जून 2025 से अब तक हमें ऐसी किसी गतिविधि का पता नहीं चला है जिससे यह संकेत मिले कि ईरान ने 2025 और 2026 के सैन्य हमलों में क्षतिग्रस्त हुए किसी भी परमाणु केंद्र की मरम्मत करने या उनका पुनर्निर्माण करने की कोशिश की है।’’
अमेरिका के राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास एवं कार्यालय ‘व्हाइट हाउस’ ने ग्रॉसी की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया के लिए मंगलवार शाम किए गए अनुरोध का तत्काल जवाब नहीं दिया।
ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। हालांकि, आईएईए के अनुसार, ईरान के पास 440.9 किलोग्राम यूरेनियम का भंडार है जिसे 60 प्रतिशत तक संवर्धित किया गया है। इसे परमाणु हथियार बनाने के लिए आवश्यक 90 प्रतिशत के स्तर तक पहुंचाने के लिए तकनीकी रूप से केवल एक छोटा कदम और उठाने की जरूरत है।
आईएईए ने परमाणु अप्रसार संबंधी दायित्वों का पालन नहीं करने को लेकर ईरान का मामला सुरक्षा परिषद को भेजा था। इसके बाद बहरीन, डेनमार्क, लातविया, फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका के अनुरोध पर मंगलवार को परिषद की बैठक बुलाई गई। ईरान के सहयोगी रूस और चीन ने बैठक रोकने की कोशिश की, लेकिन वे सफल नहीं हुए।
परमाणु अप्रसार संधि के तहत ईरान के लिए अपने सभी परमाणु पदार्थों और गतिविधियों की जानकारी देना तथा आईएईए के निरीक्षकों को उनकी जांच करने की अनुमति देना कानूनी रूप से अनिवार्य है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इनका इस्तेमाल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के अलावा किसी अन्य काम के लिए नहीं किया जा रहा। संयुक्त राष्ट्र में ईरान के उपराजदूत गुलामहुसैन दारजी ने अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद सुरक्षा परिषद की चुप्पी की आलोचना की। उन्होंने इन हमलों को ‘‘ईरान के खिलाफ आक्रामक युद्ध’’ करार दिया और अमेरिका पर ईरानी लोगों के खिलाफ युद्ध अपराध करने का आरोप लगाया।
दारजी ने निरीक्षकों को ईरान आने की अनुमति देने की मांग पर कुछ नहीं कहा। इसके बजाय उन्होंने कहा, ‘‘इजराइल के पास परमाणु हथियार हैं, लेकिन आपको चिंता इस बात की है कि ईरान में निरीक्षक मौजूद नहीं हैं।’’
इजराइल ने कभी इस बात की पुष्टि नहीं की है कि उसके पास परमाणु हथियार हैं। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत माइक वाल्ट्ज ने ईरान को ‘‘क्रूर तानाशाही वाला देश’’ करार दिया और सवाल किया कि क्या ईरानी राजदूत बहरीन पर हमला करने के लिए उसके राजदूत से माफी मांगना चाहेंगे।
वाल्ट्ज ने कहा, ‘‘हमने अमेरिका के खिलाफ लगातार आरोप सुने हैं, लेकिन आज हमें इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं मिला कि ईरान परमाणु सामग्री की निगरानी और जांच संबंधी अपने दायित्वों को पूरा करने में लगातार विफल क्यों रहा है।’’
उन्होंने कहा कि आईएईए ने ईरान से कुछ सवालों के जवाब मांगे हैं और बेहतर होगा कि ईरानी प्रतिनिधि उनके जवाब देना शुरू करें। वाल्ट्ज ने कहा, ‘‘यहां आपके झूठ नहीं चलेंगे।’’

