अमेरिका में रूसी तेल खरीदने पर 100% टैरिफ लगाने वाले बिल को भारी समर्थन मिल रहा है। 60 से ज्यादा अमेरिकी सेनेटर्स के एक ग्रुप ने इस बिल का सपोर्ट कर दिया है। यह कानून उन देशों पर 100% टेरिफ लगाएगा जो रूस के कच्चे तेल और नेचुरल गैस खरीदना जारी रखते हैं। यह रूसी फंडिंग को रोकने के लिए अब तक के सबसे सख्त अमेरिकी कदमों में से एक है। 60 से सिनेटर्स की ओर से मंजूरी मिलने के बाद इस बिल के पास होने की संभावना बहुत ज्यादा हो चुकी है। इस बिल के पास होने के बाद भारत, चीन, अज़रबैजान, हंगरी जैसे देशों पर रूसी तेल खरीद के कारण 100% टेरिफ लागू हो जाएगा। इस बिल को सेनेटर लिंसे ग्राहम ने तैयार किया था। जिनका इसी हफ्ते यूक्रेन से लौटने के बाद अचानक निधन हुआ। हालांकि यह बिल अमेरिका के यूरेनियम इंपोर्ट और उन यूरोपीय सहयोगियों को छूट देता है जो अभी भी सीमित मात्रा में रूसी गैस खरीदते हैं। यह बिल 15 यूरोपीय खरीदारों को छूट देता है।
यह अपने कुल गैस का 15% से कम आयात करते हैं। इस पर निर्भरता कम करने के लिए कदम उठा रहे हैं। इसका मतलब यह है कि रूस से गैस खरीदने वाले इन देशों पर किसी भी तरह का कोई टेरिफ नहीं होगा। साथ ही इस बिल के तहत रूसी यूरेनियम खरीद पर भी छूट दी गई है जो अमेरिका भारी मात्रा में रूस से खरीदता है। 60 से ज्यादा सेनेटर्स का समर्थन मिलने के बाद इसे वाइट हाउस का भी समर्थन मिल रहा है। हाल ही में सेनेटर लिंसेग्राम के अचानक निधन के बाद इस बिल का राजनीतिक महत्व बढ़ गया। उन्होंने अपनी मौत से पहले प्रशासन के साथ इस कानून को तैयार करने में लगभग 2 साल बिताए। अब देखिए कि किस तरह से अमेरिका दोहरे मापदंड अपनाता है और खुद के गर्दन को बचा रहा है और यूरोपीय देशों को भी छूट दे रहा है। लेकिन भारत चीन जैसे देशों के खिलाफ वो अपनी आंखें टेढ़ी कर रहा है। इस बिल के केंद्र में सेक्शन 113 है। यह राष्ट्रपति को निर्देश देता है वो इन देशों से इंपोर्ट होने वाले सामान पर 100% टेरिफ लगाएं। जिसकी पहचान बीते 12 महीनों में रूसी कच्चे तेल या नेचुरल गैस के पांच बड़े इंपोर्टर्स के तौर पर हुई। या जो रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले पांच देशों में शामिल हो।
इस बिल का खास टारगेट चीन और भारत को ही माना जा रहा है। यह बिल सीधे रूस से इंपोर्ट होने वाले सामान पर 500% तक टेरीफ लगाने का अधिकार भी देते हैं। इसके साथ ही इसमें क्रिमिनल के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व उसके बड़े बैंकों और रूस के डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस से जुड़ी कंपनियों पर कड़े प्रतिबंध लगाने का प्रावधान देते हैं। इस बिल का दायरा बहुत बड़ा है। फिर भी रूस से यूरेनियम खरीदने के प्रतिबंधों से यह साफ तौर पर छूट देता है। तो एक तरफ अमेरिका और यूरोप के लिए तमाम तरह के छूट के प्रावधान इस बिल में कर दिए गए हैं। अलग-अलग सेक्शंस के जरिए अब रास्ता निकाल दिया गया है कि अमेरिका रूस से इनरिचड यूरेनियम खरीद पाए। वहीं यूरोप के देश गैस ले पाए लेकिन भारत और चीन जैसे देश तेल ना लेने पाए। यह साफ तौर पर दोहरा मापदंड दिखाता है। इस बिल पर अभी तक भारत की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन अमेरिका का यह रवैया बताता है कि वो विश्वसनीय बिल्कुल भी नहीं है और रूस से दोस्ती की सजा भारत और चीन को देना चाहता है।
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