अमेरिका लगातार ईरान के चाबहार बंदरगाह को निशाना बना रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि क्या इस हमले से भारत की बहुचर्चित चाबहार परियोजना को भी कोई नुकसान पहुंचा है? इसी बीच अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने एक वीडियो साझा कर सनसनी और बढ़ा दी, जिसमें लगातार हमलों के बाद एक टावर ढहता हुआ दिखाई दे रहा है। यह वीडियो चाबहार बंदरगाह के टावर का बताया जा रहा है, हालांकि अमेरिकी रक्षा मंत्री ने स्वयं इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। उधर, नई दिल्ली के सूत्रों का कहना है कि चाबहार बंदरगाह पर भारत से जुड़ी परियोजना पूरी तरह सुरक्षित है और उसे किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचा है। हालांकि भारत सरकार की ओर से अब तक इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। इस बीच, ईरानी सरकारी मीडिया ने भी चाबहार पर तीसरी बार अमेरिकी हमले होने की पुष्टि की है। ईरान का कहना है कि यह टावर बंदरगाह पर आने वाले व्यावसायिक यातायात की निगरानी करता था।
हम आपको बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अंतरिम युद्धविराम को समाप्त मानने की घोषणा के बाद अमेरिकी सेना ने ईरान में व्यापक सैन्य अभियान छेड़ दिया है। अमेरिका का दावा है कि इन हमलों का उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करना और होरमुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों के लिए खतरा पैदा करने वाली सैन्य ताकत को समाप्त करना है। हमलों में कश्म द्वीप, बंदर अब्बास, चाबहार, कोनारक, सिरिक और बुशेहर समेत कई स्थानों को निशाना बनाया गया है। ईरानी मीडिया के अनुसार चाबहार में कई विस्फोट हुए, आधारभूत ढांचे को नुकसान पहुंचा और कई इलाकों में बिजली आपूर्ति भी बाधित हो गई।
अमेरिका के अनुसार लड़ाकू विमान, मानवरहित विमान और युद्धपोतों की मदद से तटीय निगरानी केंद्र, वायु रक्षा प्रणाली, सैन्य रसद ढांचा और समुद्री सैन्य क्षमताओं से जुड़े दर्जनों ठिकानों पर हमला किया गया। दूसरी ओर ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई तेज करते हुए बहरीन, कुवैत और अन्य खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और मानवरहित विमानों से हमले करने का दावा किया है। इससे पहले जॉर्डन में अमेरिकी वायुसेना अड्डे को भी निशाना बनाया जा चुका है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे अधिक चिंता भारत को सता रही है, क्योंकि चाबहार बंदरगाह नई दिल्ली की सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं में से एक है। ओमान की खाड़ी पर स्थित चाबहार ईरान का एकमात्र गहरे पानी वाला बंदरगाह है, जहां से सीधे हिंद महासागर तक पहुंच संभव है। यही बंदरगाह भारत को अफगानिस्तान, मध्य एशिया, कैस्पियन क्षेत्र, रूस और आगे यूरोप तक पहुंचाने वाले अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारे का महत्वपूर्ण केंद्र है। इस परियोजना का उद्देश्य माल ढुलाई का समय घटाना, लागत कम करना और भारत को पश्चिम तथा मध्य एशिया से सीधे जोड़ना है।
भारत दो दशक से अधिक समय से चाबहार परियोजना से जुड़ा हुआ है। वर्ष 2002 में शुरू हुआ सहयोग वर्ष 2003 में भारत और ईरान के बीच रणनीतिक साझेदारी के समझौते के साथ आगे बढ़ा। वर्ष 2016 में भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच त्रिपक्षीय समझौते के बाद इस परियोजना को नई गति मिली थी। भारत ने शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के विकास पर कम से कम बारह करोड़ डॉलर का निवेश किया और वर्ष 2017 में इसके पहले चरण का उद्घाटन हुआ। इसी बंदरगाह के रास्ते भारत ने पहली बार अफगानिस्तान को गेहूं की खेप भी भेजी थी।
चाबहार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके माध्यम से भारत को पाकिस्तान की जमीन का उपयोग किए बिना अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच मिलती है। यही कारण है कि इसे भारत की सामरिक और व्यापारिक नीति का आधार स्तंभ माना जाता है। इसके अलावा पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह, जिसे चीन का समर्थन प्राप्त है, उसके मुकाबले चाबहार भारत की रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत करता है और हिंद महासागर क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।
हालांकि अमेरिका के ताजा हमलों ने इस पूरी परियोजना के भविष्य पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। पर प्रत्यक्ष रूप से भारत के वर्तमान संचालन पर कोई असर नहीं पड़ा है, लेकिन सुरक्षा जोखिम और बढ़ गया है। इससे पहले अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भी चाबहार परियोजना कई बार बाधित हो चुकी है। वर्ष 2025 में अमेरिका ने ईरान से जुड़े प्रतिबंधों में चाबहार को मिली छूट भी समाप्त कर दी थी, जिसके बाद भारत को चाबहार मुक्त क्षेत्र में अपनी हिस्सेदारी एक स्थानीय ईरानी इकाई को हस्तांतरित करनी पड़ी। उस समय भारत ने स्पष्ट किया था कि वह तेहरान और वाशिंगटन दोनों के साथ लगातार संपर्क में है और बदलते हालात पर नजर रखे हुए है।
बीते जून में अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के बाद उम्मीद जगी थी कि चाबहार परियोजना का विस्तार फिर से गति पकड़ेगा और दोनों देश सामान्य संचालन बहाल करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। लेकिन ताजा सैन्य संघर्ष ने उन उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया है। दक्षिणी ईरान में लगातार हो रहे हमलों ने इस रणनीतिक बंदरगाह के विस्तार, सुरक्षा और भविष्य की योजनाओं को फिर अनिश्चितता के घेरे में ला खड़ा किया है।
बहरहाल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती यह जंग अब केवल सैन्य संघर्ष नहीं रह गई है। इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार, क्षेत्रीय संपर्क, आपूर्ति श्रृंखला और पश्चिम एशिया में उसके दीर्घकालिक रणनीतिक हितों पर पड़ सकता है। ऐसे में नई दिल्ली के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संतुलित कूटनीतिक संबंध बनाए रखने की होगी। फिलहाल चाबहार पर मंडराता संकट भारत के लिए केवल एक बंदरगाह का नहीं, बल्कि उसकी पूरी क्षेत्रीय संपर्क नीति और भविष्य की सामरिक रणनीति की परीक्षा बन गया है। जहां तक इस क्षेत्र में अमेरिकी हमलों की बात है तो भारत सरकार के सूत्रों का कहना है कि हमारे बुनियादी ढांचे पर किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुँचा है।
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