77 साल तक इजराइल तुर्की के इतिहास के सबसे विवादित मुद्दे पर चुप रहा। लेकिन अब उसने अचानक एक ऐसा कदम उठाया है जिसने तुर्की की टेंशन तो बढ़ा दी है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस फैसले से भारत को भी रणनीतिक फायदा मिलेगा। दरअसल इजराइल की कैबिनेट ने एक प्रस्ताव को मंजूरी दी है। जिसमें 1915 में ऑटोमन साम्राज्य यानी कि आज के तुर्की द्वारा अर्मेनियाई लोगों की हुई हत्याओं को आधिकारिक तौर पर नरसंहार माना गया। हालांकि यह प्रस्ताव अभी अंतिम नहीं है क्योंकि इसे कानून बनाने के लिए इजराइली संसद की मंजूरी मिलना अभी बाकी है। अगर संसद भी इस इसे मंजूरी दे देती है तो इजराइल भी उन देशों में शामिल हो जाएगा जिन्होंने इस घटना को नरसंहार के रूप में स्वीकार किया है। दूसरी तरफ तुर्की आज भी इस शब्द को पूरी तरह खारिज करता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इजराइल ने 77 साल तक चुप रहने के बाद अचानक ऐसा फैसला इस तुर्की के खिलाफ क्यों लिया? इसकी सबसे बड़ी वजह है दोनों देशों के लगातार बिगड़ते हुए रिश्ते।
गाजा युद्ध के बाद तुर्की के राष्ट्रपति और एदोर्गन जो है यह लगातार इजराइल की आलोचना करते हुए नजर आए हैं। जवाब में अब इजराइल तुर्की पर सिर्फ सैन्य या फिर कूटनीतिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक और नैतिक दबाव भी बनाना चाहता है। इसलिए कई एक्सपर्ट्स इस इजराइल के फैसले को इतिहास से ज्यादा मौजूद भू राजनीति का हिस्सा मान रहे हैं। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती है क्योंकि अब इसमें एंट्री होती है भारत की भी। तुर्की पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान का खुला समर्थक रहा है और कश्मीर के मुद्दे पर भी भारत के खिलाफ लगातार बयान भी देता रहा है। वहीं तुर्की और अज़रबजान के बीच भी बेहद करीबी रणनीतिक रिश्ते हैं। दूसरी तरफ भारत ने हाल के वर्षों में अर्मेनिया के साथ अपने रक्षा संबंध लगातार मजबूत किए हैं और उसे हथियार भी उपलब्ध कराए हैं। ऐसे में अगर इजराइल तुर्की पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाता है तो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन भारत के लिए कुछ मामलों में पहले से ज्यादा अनुकूल हो सकता है।
भारत ने जो रणनीतिक साझेदारी अर्मेनिया के साथ बनाई है, उससे प्रत्यक्ष कूटनीतिक मजबूती मिल सकती है। इसका मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि भारत और इजराइल मिलकर तुर्की के खिलाफ कोई संयुक्त अभियान चला रहे हैं या फिर उसे निशाना कर रहे हैं। लेकिन इतना जरूर है कि तुर्की को लेकर दोनों देशों के रणनीतिक हित कई जगह पर एक दूसरे से करीब और मेल खाते हुए दिखाई दे रहे हैं। यही वजह है कि इस फैसले को सिर्फ इतिहास नहीं बल्कि बदलते वैश्विक समीकरण का एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। अब सबकी नजर इजराइली संसद पर होगी।
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