ईरान के बाद अमेरिका का अगला हमला इस देश पर हो सकता है। इस देश का नाम है क्यूबा जिसे कैरेबियन क्रोकोडाइल भी कहते हैं। क्योंकि नक्शे पर देखने में यह देश एक मगरमच्छ की तरह लगता है। इसका जो आकार है वो एक मगरमच्छ की तरह है। पहले वेनेजुएला और फिर ईरान के बाद राष्ट्रपति ट्रंप की अगली नजर इसी देश पर है और उनकी अगली कार्रवाई क्यूबा में हो सकती है। ईरान के साथ युद्ध को औपचारिक रूप से खत्म करने से पहले ही, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि वे जल्द ही विदेशों में अमेरिकी सैन्य दखल का अगला चरण शुरू कर सकते हैं। 250वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में ट्रंप ने कहा कि वेनेजुएला और ईरान में युद्ध खत्म करने के बाद उनके पास आगे के लिए और भी योजनाएं हैं। ट्रंप ने कहा कि हमारी सेना कितनी बेहतरीन है! बस एक हफ़्ता! ईरान तो असल में एक घंटे में ही खत्म हो गया था। वेनेजुएला का काम भी तमाम हो गया था और मुझे लगता है कि हमारे पास आगे के लिए और भी योजनाएं हैं, लेकिन हम जोश में आकर कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहते। हालांकि ट्रंप ने विस्तार से कुछ नहीं कहा, लेकिन उन्होंने पहले ही यह कह दिया है कि क्यूबा अगला देश हो सकता है जिस पर वह हमला करेंगे।
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ट्रंप ने मार्च में कहा था, मैंने यह ज़बरदस्त सेना बनाई है। मैंने कहा था,आपको कभी इसका इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा। लेकिन कभी-कभी आपको इसका इस्तेमाल करना ही पड़ता है। वैसे, क्यूबा अगला नंबर है। वेनेज़ुएला की तरह, क्यूबा ने भी द्वीप के आस-पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में अमेरिकी सैन्य कर्मियों और संसाधनों की तैनाती देखी है। यह देश पहले से ही अमेरिकी नाकेबंदी का सामना कर रहा है, जिसके कारण बड़े पैमाने पर ऊर्जा संकट पैदा हो गया है। ईरान या वेनेज़ुएला के उलट, क्यूबा के नेता ट्रंप की मांगों को मानने के लिए तैयार दिख रहे हैं और अमेरिका को खुश करने के लिए आर्थिक बदलावों का वादा कर रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था को बदलने के लिए उन्होंने पिछले हफ़्ते बड़े सुधार लागू किए। लेकिन क्यूबा अब भी एक पार्टी वाला देश बना हुआ है, जहाँ असल में कोई लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया नहीं है। ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि वे देश में आर्थिक और राजनीतिक, दोनों तरह के सुधार चाहते हैं।
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ट्रंप क्यूबा पर कब्जा क्यों करना चाहते हैं?
इसकी तीन वजह हैं। पहला अमेरिका और क्यूबा के बीच की दूरी। क्यूबा एक बहुत ही छोटा सा देश है लेकिन अमेरिका से सिर्फ 145 कि.मी. दूर है। यानी अमेरिका से बिल्कुल सटा हुआ है। क्यूबा की जनसंख्या सिर्फ 1 करोड़ है। यानी आप समझ लीजिए हमारे उत्तराखंड राज्य से भी कम। दूसरा क्यूबा की सरकार की विचारधारा। क्यूबा में इस समय कम्युनिस्ट सरकार है। यानी रणनीतिक तौर पर अमेरिका की विचारधारा का विरोधी देश क्यूबा है। क्यूबा कम्युनिस्ट है और वो अमेरिका का विरोधी है। और तीसरा क्यूबा पर कब्जा करके राष्ट्रपति ट्रंप वर्ष 1959 का बदला लेना चाहते हैं। क्योंकि आज से 67 वर्ष पहले वर्ष 1959 में क्यूबा में अमेरिका विरोधी सरकार की स्थापना हुई थी। जिसे आज तक अमेरिका भी बदल नहीं पाया। वहां की जो सरकार है वह अमेरिका की कट्टर विरोधी है और राष्ट्रपति ट्रंप को अपना विरोध पसंद नहीं। चाहे वह वेनेजुएला में हो, चाहे वो ईरान में हो या फिर क्यूबा में हो।
अमेरिका और क्यूबा का 67 साल पुराना झगड़ा
वर्ष 1959 में फिडल कास्ट्रो के नेतृत्व में क्यूबा में एक क्रांति हुई थी और अमेरिका समर्थित तानाशाह बतिस्ता को सत्ता से तब हटा दिया गया था। इसके बाद क्यूबा ने समाजवादी रास्ता अपनाया। क्यूबा एक समाजवादी देश बन गया और अपने देश में मौजूद तमाम अमेरिकी कंपनियों का उन्होंने राष्ट्रीयकरण कर दिया। इससे अमेरिका बहुत नाराज हो गया। उस समय दुनिया में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच एक शीत युद्ध चल रहा था। कोल्ड वॉर चल रहा था। क्यूबा में जो नई सरकार बनी वो कम्युनिस्ट सरकार थी, वामपंथी थी और इसीलिए सत्ता परिवर्तन के बाद ही क्यूबा सोवियत संघ के बहुत करीब चला गया। अमेरिका को अपने पड़ोस में एक कम्युनिस्ट सरकार और एक कम्युनिस्ट देश स्वीकार नहीं था और वह भी ऐसा देश जो सोवियत संघ का मित्र है। इसके बाद अमेरिका ने क्यूबा पर बहुत प्रकार के आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए और वर्ष 1961 में अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए ने क्यूबा में एक ऑपरेशन चलाया था। इस ऑपरेशन को बे ऑफ पिग्स का नाम दिया गया। बे ऑफ पिग्स। इसका मकसद क्यूबा की क्रांतिकारी सरकार को गिराना था। लेकिन यह ऑपरेशन असफल रहा और इसे अमेरिकी विदेश नीति की सबसे बड़ी असफलताओं में से एक माना जाता है। इस घटना के बाद क्यूबा ने अपनी सुरक्षा के लिए सोवियत संघ से और ज्यादा सहयोग लेना शुरू कर दिया।
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