अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट (SUMP) सामान्य जल प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण या पारंपरिक जलविद्युत उत्पादन के दायरे से कहीं आगे बढ़कर एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक राष्ट्रीय सुरक्षा पहल का प्रतिनिधित्व करता है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के करीब उस क्षेत्र में स्थित, जिस पर बीजिंग जांगनान या दक्षिणी तिब्बत का नाम देकर बार-बार दावा करता रहा है, यह परियोजना विवादित सीमावर्ती क्षेत्रों में भारत की दीर्घकालिक उपस्थिति और परिचालन संबंधी तैयारियों को ज़मीनी तौर पर मजबूती से स्थापित करने का काम करती है। जहाँ एक ओर स्थानीय चिंताएँ अपर सियांग, सियांग और ईस्ट सियांग जिलों के लगभग 27 आदि आदिवासी गाँवों के डूबने के खतरे और 1 से 1.5 लाख निवासियों के विस्थापन पर केंद्रित हैं, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय रक्षा प्राथमिकताएँ अग्रिम मोर्चों को सुरक्षित रखने की रणनीतिक आवश्यकता के इर्द-गिर्द आकार ले रही हैं। पासीघाट, यिंगकियोंग और गेकू जैसी प्रमुख बस्तियाँ एक महत्वपूर्ण मानवीय और लॉजिस्टिक बफर का काम करती हैं। इन सीमावर्ती क्षेत्रों में निरंतर आर्थिक गतिविधियों, स्थानीय रोजगार और आधुनिक बुनियादी ढांचे के विकास से मूल निवासी समुदायों को वहीं बनाए रखने में मदद मिलती है। इससे यहाँ ऐसी जनसांख्यिकीय शून्यता पैदा नहीं होती, जिसका फायदा उठाकर बाहरी ताकतें अपने प्रभाव या क्षेत्रीय दावों के जरिए स्थिति का लाभ उठा सकें। यह दृष्टिकोण सीधे तौर पर ‘वाइब्रेंट विलेजेस प्रोग्राम’ की सोच को दर्शाता है, जो LAC के पार चीन द्वारा बसाई गई ‘शियाओकांग’ सीमावर्ती बस्तियों के खिलाफ एक प्रभावी संतुलन का काम करता है।
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सेना की ताकत बनेगा यह मेगा प्रोजेक्ट
दुर्गम पहाड़ियों में बन रही यह विशाल परियोजना केवल बिजली या पानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सेना के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच तैयार कर रही है। निर्माण कार्य के लिए बनने वाली मजबूत सड़कें, भारी पुल और ट्रांजिट कॉरिडोर आगे चलकर सेना के लिए ‘दोहरे उपयोग’ वाली रणनीतिक संपत्ति साबित होंगे। इससे वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारतीय सेना और BRO की गाड़ियों की रफ्तार कई गुना बढ़ जाएगी और घाटियों के बीच मूवमेंट का समय भी घटेगा। यह पूरा ढांचा ‘प्रोजेक्ट अरुणांक’ और रणनीतिक ‘अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे’ (NH-913) से जुड़कर सीमा पर भारत की लॉजिस्टिक्स सप्लाई लाइन को अभेद्य बना देगा। परिवहन सुविधाओं के अलावा, बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पादन पूर्वी LAC के पास स्थित अग्रिम सुरक्षा चौकियों (forward security posts) के सामने आने वाली एक बड़ी परिचालन बाधा को सीधे तौर पर दूर करता है। भारतीय सेना, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) और अन्य रक्षा इकाइयों द्वारा संचालित इन अग्रिम चौकियों को वर्तमान में बिजली की भारी कमी का सामना करना पड़ता है। एक बड़ा बिजली उत्पादन केंद्र और उससे जुड़ा ट्रांसमिशन नेटवर्क एक मजबूत पावर बैकबोन (ऊर्जा आधार) तैयार करता है। इससे मैदानी इलाकों से आने वाली लंबी और असुरक्षित बिजली लाइनों पर निर्भर रहे बिना, इन क्षेत्रों में सेना की निरंतर उपस्थिति बनाए रखना आसान हो जाता है।
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अरुणाचल प्रदेश के भीतरी इलाकों में महत्वपूर्ण राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे का निर्माण और संचालन, ज़मीनी स्तर पर भारत के वास्तविक प्रशासनिक और परिचालन नियंत्रण को और मज़बूत करता है। बड़े बिजली संयंत्रों, सड़कों के नेटवर्क, प्रशासनिक केंद्रों और सक्रिय आर्थिक क्षेत्रों की मौजूदगी, बाहरी ताकतों द्वारा किए जाने वाले एकतरफा दावों को समय के साथ बनाए रखना बहुत मुश्किल बना देती है। अधिक ऊंचाई वाले ऐसे दुर्गम इलाकों में, जहाँ खराब मौसम और कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ आवाजाही को बहुत सीमित कर देती हैं, एक अच्छी तरह से जुड़े हुए बहु-उपयोगी केंद्र की स्थापना भारत की उस क्षमता को काफी बढ़ा देती है, जिससे वह सीमा पर लंबे समय तक चलने वाले गतिरोध के दौरान अपनी सेनाओं को ज़रूरी सामग्री पहुँचाने, तैनात करने और वहाँ बनाए रखने में सक्षम हो सके।

