एक तरफ सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच तनाव चरम पर है तो दूसरी तरफ अमेरिका और ईरान के बीच भी टकराव बढ़ने की आशंका बनी हुई है। अमेरिका की ओर से ईरान पर दोबारा हमले की चर्चाओं के बीच मिडिल ईस्ट में हालात लगातार संवेदनशील बने हुए हैं। लेकिन इसी बीच 26 अक्टूबर को ईरान की राजधानी तेहरान में कुछ ऐसा हुआ जिसने सबका ध्यान खींचा है। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बड़े अधिकारी ईरान पहुंच गए और चारों देशों के प्रतिनिधियों ने एक साथ बैठकर क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा पर चर्चा की। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन देशों के हित अलग-अलग हैं, वे अचानक एक साथ क्यों आए हैं? क्या यह देश मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव को रोकने की कोशिश कर रहे हैं? या फिर अमेरिका की रणनीति से अलग क्षेत्रीय सुरक्षा का कोई नया रास्ता तलाशा जा रहा है।
इसे भी पढ़ें: नेतन्याहू हारे तो ये होंगे नए इजरायली प्रधानमंत्री, क्या करेगा भारत?
दरअसल बैठक की मेजबानी ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मेजर जनरल मोहसेन रिजाई ने की। इसमें सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर और तुर्की की खुफिया एजेंसी के प्रमुख इब्राहिम कलीन शामिल हुए। ईरान की ओर से विदेश मंत्री अब्बास अरागच्ची भी बैठक में मौजूद रहे। बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में कहा गया कि चारों देश क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा और स्थिरता के लिए बातचीत जारी रखेंगे। हालांकि किसी नए सैन्य समझौते या संयुक्त सुरक्षा व्यवस्था की घोषणा नहीं की गई। इस बैठक का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बना हुआ है। ईरान को आशंका है कि अमेरिका इजराइल उस पर फिर से हमला कर सकते हैं। वहीं सऊदी अरब को यमन के होती विद्रोहियों के हमलों की चिंता है। ऐसे माहौल में इन देशों का एक साथ बैठना क्षेत्रीय राजनीति में अहम घटनाक्रम माना जा रहा है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशियान ने भी पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के प्रतिनिधियों से मुलाकात की। उन्होंने इस्लामी देशों से आपसी मतभेद दूर कर एकजुट होने की अपील की। पेजेशकियान का कहना था कि क्षेत्र की सुरक्षा के लिए बाहरी ताकतों पर निर्भर रहने के बजाय पड़ोसी देशों को मिलकर काम करना चाहिए।
इसे भी पढ़ें: नेतन्याहू के हारते ही ईरान में तबाही, इजरायल का क्या है सीक्रेट प्लान?
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने भी बैठक को क्षेत्रीय सुरक्षा की दिशा में एक व्यावहारिक कदम बताया। उनके मुताबिक पिछले दो वर्षों की घटनाओं ने साबित किया है कि आपसी भरोसे के बिना क्षेत्र में स्थाई शांति कायम करना मुश्किल है। इस बैठक को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह देश अमेरिका की रणनीति से अलग अपना रास्ता तैयार कर रहे हैं? पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की एक रक्षा समझौते के सदस्य हैं, जिसे मक्का रक्षा समझौते के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के बाद तीनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों की ईरान की यह पहली संयुक्त यात्रा है। ईरान चाहता है कि क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसले पश्चिमी देशों के बजाय इसी क्षेत्र के देश मिलकर करें। ईरानी अधिकारियों ने भी संकेत दिया है कि पड़ोसी देशों के बीच सहयोग बढ़ाकर सुरक्षा का ऐसा ढांचा तैयार किया जा सकता है जिसमें बाहरी हस्तक्षेप की जरूरत कम हो। वहीं इस बैठक का एक दूसरा पहलू सऊदी अरब और ईरान के रिश्ते हैं। दोनों देशों के बीच लंबे समय तक तनाव रहा है।

