(सोनिया रिजाल एंड नादेर नादेरपाजौह, यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी)
सिडनी, तीन सितंबर (द कन्वरसेशन) नेपाल-तिब्बत सीमा से सटे इलाकों में रह रहे समुदायों के लिए दुनियाभर के लोगों के दिलों में संवेदनाएं उमड़ रही हैं। पिछले बुधवार आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे गांवों को तबाह कर दिया और दर्जनों महत्वपूर्ण पुलों तथा सड़कों को तेज धार अपने साथ बहा ले गई। इस आपदा में 1,000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है।
अधिकारी अब भी लापता हजारों लोगों की तलाश में जुटे हैं और जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे सैकड़ों श्रमिकों को निकालने के प्रयास किए जा रहे हैं। बाढ़ के बाद दुनियाभर के देशों और संगठनों ने बचाव तथा मानवीय सहायता प्रयासों में मदद के लिए हाथ बढ़ाया है। हालांकि, किसी भी आपदा के बाद राहत एवं बचाव कार्यों से पुनर्वास और पुनर्निर्माण की ओर बढ़ना आसान नहीं होता।
इस लेख की सह-लेखक और नेपाल की नागरिक सोनिया ने 2015 में नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के बाद प्रभावित समुदायों को मानवीय सहायता पहुंचाते समय इस चुनौती को करीब से अनुभव किया था। हमारे शोध से सामने आया कि आपदा से प्रभावित क्षेत्रों को दोबारा खड़ा करने और उनके पुनर्निर्माण में स्थानीय समुदायों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई बाढ़ की भयावहता और इसके व्यापक प्रभाव का अंदाजा लगाना मुश्किल है।
दुनियाभर के परिवार शोक में डूबे हैं और कई लोग अब भी यह जानने के लिए चिंतित हैं कि उनके प्रियजन जीवित हैं या नहीं। बाढ़ ने भारी जनहानि के अलावा महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के पूरे नेटवर्क को भी तबाह कर दिया। सबसे अधिक प्रभावित जिलों में सड़कें, पुल, बिजली की लाइनें और नदी के जलस्तर की निगरानी करने वाले उपकरण क्षतिग्रस्त होकर ढह गए हैं।
इससे प्रभावित लोगों तक चिकित्सा सहायता और जरूरी सामान पहुंचाने के महत्वपूर्ण रास्ते भी बंद हो गए हैं। स्थानीय बुनियादी ढांचे से जुड़ी सेवाओं की मांग इस समय सबसे अधिक है। विस्थापित परिवारों को आश्रय की तलाश है, घायल लोग अस्पताल पहुंचने के लिए परेशान हैं और कई लोग अपने मृत परिजनों की पहचान होने का घंटों और दिनों से इंतजार कर रहे हैं।
नेपाल से विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत दिखाने वाली कई उल्लेखनीय कहानियां सामने आ रही हैं। इनमें एक स्कूल शिक्षक की कहानी भी शामिल है, जिसने बाढ़ आने की चेतावनी देने वाले कई फोन आने के बाद सैकड़ों बच्चों की जान बचाई। इसी तरह, ऊपरी इलाकों के गांवों के लोगों ने निचले इलाकों में रहने वाले समुदायों को बाढ़ आने की सूचना देकर सतर्क किया।
ये घटनाएं आपदा की चेतावनी देने और उससे निपटने में स्थानीय समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाती हैं। सरकारी एजेंसियों के पास हर बार उतने संसाधन नहीं होते कि वे स्थानीय शिक्षक जितनी तेजी से समुदायों को खतरे की चेतावनी दे सकें। ऐसे में वे नेपाल की ‘गुठी’ जैसी अनौपचारिक व्यवस्थाओं के साथ मिलकर काम कर सकती हैं।
‘गुठी’ एक तरह की सामाजिक सहायता व्यवस्था है, जो किसी खास समुदाय के धार्मिक स्थलों, परंपराओं और लोगों के कल्याण की देखभाल करती है। स्थानीय सामाजिक नेटवर्क को आपदा के समय भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इनके जरिए ‘फोन श्रृंखला’ बनाई जा सकती है, जिसमें एक व्यक्ति कई अन्य लोगों को खतरे की सूचना देता है और वे आगे दूसरों को सतर्क करते हैं।
इससे सरकारी चेतावनी व्यवस्था को और प्रभावी बनाया जा सकता है। ऐसे सामाजिक नेटवर्क में महिलाओं के सूक्ष्म वित्त एवं सहकारी समूहों से लेकर सामुदायिक वन उपभोक्ता समूह तक शामिल हैं, जो मिलकर स्थानीय जंगलों का प्रबंधन करते हैं। इन समूहों को अक्सर यह जानकारी होती है कि कौन अकेले रह रहा है, किन घरों में बुजुर्ग रहते हैं और पर्यटन के व्यस्त मौसम में कौन से ट्रेकिंग लॉज भर जाते हैं।
आपदा आने से पहले इस स्थानीय जानकारी का इस्तेमाल करना बेहद महत्वपूर्ण है और इससे कई लोगों की जान बचाई जा सकती है। जब बुनियादी ढांचा आपदा के समय तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने में नाकाम रहता है, तो स्थानीय समुदाय अपने स्तर पर वैकल्पिक व्यवस्था करते हैं और मिलकर काम शुरू कर देते हैं। राहत एवं बचाव दलों के साथ मिलकर स्थानीय लोग क्षतिग्रस्त सड़कों पर मरीजों को उठाकर ले जाते हैं, संचार नेटवर्क ठप होने पर संदेश पहुंचाते हैं और विद्यालयों, मठों व घरों को अस्थायी आश्रय में बदल देते हैं।
आपदा के दौरान और उसके बाद समुदायों के आपसी नेटवर्क को भी नए तरीके से काम करने की जरूरत पड़ सकती है। इसके तहत संचार के नए माध्यम विकसित करना या मौजूदा नेटवर्क का अलग-अलग जरूरतों के लिए इस्तेमाल करना शामिल हो सकता है। उदाहरण के लिए, नेपाल में स्थानीय परिवहन नेटवर्क ने बाढ़ से तबाह इलाकों में पानी, भोजन और कपड़े पहुंचाने का काम शुरू कर दिया है।
वहीं, रेस्तरां ऐसे परिवारों को गर्म भोजन उपलब्ध करा रहे हैं, जिनकी पहचान समुदाय समूहों ने विशेष रूप से कमजोर या जरूरतमंद के रूप में की है। आपदा के बाद पुनर्वास और पुनर्निर्माण के चरण में समुदाय की अगुवाई में किए जाने वाले प्रयास सबसे अधिक महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। आपदा के तुरंत बाद मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय सहायता और आर्थिक मदद समय के साथ कम हो सकती है।
मीडिया का ध्यान भी धीरे-धीरे कम हो जाता है या वह अगली आग अथवा बाढ़ जैसी किसी नई आपदा की ओर मुड़ जाता है। इस दौरान आपदा से प्रभावित समुदाय सामान्य जनजीवन में लौटने की पूरी कोशिश करते हैं। इसके लिए उन्हें खास तौर पर पर्याप्त मदद और परामर्श की जरूरत होती है, ताकि वे अपने घरों, कारोबार व सामाजिक नेटवर्क समेत भविष्य का नए सिरे से निर्माण कर सकें।
नेपाल-तिब्बत सीमा से लगे इलाकों में पुनर्वास और पुनर्निर्माण की लंबी प्रक्रिया अभी शुरू ही हुई है। गहरे दुख और नुकसान के बीच स्थानीय समुदाय अपने सबसे कमजोर पड़ोसियों की मदद के लिए पहले ही आगे आ रहे हैं। सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भी उनके इस प्रयास से सीख लेते हुए उसी दिशा में काम करना चाहिए।

