एक ऐसा देश जिसे कभी कच्चे तेल के लिए पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर माना जाता था, आज वह दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों को उनके अपने ही खेल में मात दे रहा है। भारत ने इतिहास रच दिया है। पहली बार भारत ने सऊदी अरब और यूनाइटेड अरब अमीरात यानी यूएई जैसे तेल के दिग्गजों को पछाड़ते हुए अफ्रीका के एक बेहद महत्वपूर्ण देश केन्या का सबसे बड़ा पेट्रोल सप्लायर बनने का गौरव हासिल किया है। यह सिर्फ एक व्यापारिक समझौता नहीं बल्कि ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स में भारत के बढ़ते वर्चस्व और न्यू इंडिया की फॉरेन पॉलिसी का सीधा सबूत है। दरअसल केन्या जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दशकों से सऊदी अरब और यूएई पर निर्भर था आज भारत की ओर क्यों देख रहा है? इसके पीछे एक बड़ी वजह है सुरक्षा और स्थिरता का भरोसा। हाल के समय में मिडिल ईस्ट के हालात और ग्लोबल सप्लाई चेन में आई रुकावटों ने केन्या को डरा दिया था।
केन्या को यह डर सताने लगा था कि क्या सऊदी और यूएई उसे भविष्य में सुरक्षित रूप से तेल मुहैया करा पाएंगे। अब तेल का संकट किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को तबाह कर सकता है। ऐसे में केन्या ने एक साहसिक फैसला लिया। उसने अपने पुराने पार्टनर्स को पीछे छोड़ते हुए भारत को अपना प्राइम सप्लायर चुन लिया। इस समय केन्या के तमाम बड़े तेल कॉन्टैक्ट्स भारत की झोली में आ रहे हैं। यह भारत की विश्वसनीयता का प्रमाण है कि एक अफ्रीकी देश ने उस पर अपनी पूरी इकॉनमी की चाबी सौंप दी है। अब यहां एक तकनीकी सवाल यह उठता है कि कई लोग कहेंगे कि सऊदी और यूएई तो कच्चे तेल के राजा हैं तो भारत ने उन्हें कैसे पछाड़ा? दरअसल इसका जवाब बहुत सीधा है।
अफ्रीका के 90% से ज्यादा देश कच्चा तेल खरीदते ही नहीं। क्यों? क्योंकि कच्चे तेल को रिफाइन करना यानी उसे पेट्रोल, डीजल या विमान ईंधन में बदलना एक बहुत ही खर्चीला और जटिल काम है। एक रिफाइनरी खड़ी करने में अरबों डॉलर लगते हैं और उसे चलाने की तकनीक हर देश के पास नहीं होती है। अफ्रीकी देश यह भारी खर्च अफोर्ड नहीं कर सकते हैं। इसलिए वह सीधा फिनिश्ड प्रोडक्ट यानी कि पेट्रोल और डीजल मंगाते हैं और यही भारत का सबसे मजबूत पक्ष है। भारत दुनिया का रिफाइनिंग हब बन चुका है। हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरीज हैं। भारत कच्चा तेल खरीदता है। उसे वर्ल्ड क्लास क्वालिटी में रिफाइन करता है और फिर पूरी दुनिया को बेचता है। केन्या के मामले में भी यही हुआ। उन्हें पेट्रोल चाहिए था और भारत ने उन्हें सबसे बेहतर डील और सुरक्षा दे दी है। यह जीत सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि सामरिक भी है।
याद कीजिए जब पहले कभी केन्या या अफ्रीकी देशों में तेल का संकट आता था तो वह किसकी तरफ देखते थे? अमेरिका, रूस या सबसे ज्यादा चीन पर। चीन ने पिछले दो दशकों में अफ्रीका में भारी निवेश करके वहां के देशों को अपने कर्ज के जाल में फंसाया। लेकिन भारत की रणनीति अलग है। भारत निर्भरता नहीं साझेदारी में विश्वास रखता है। केन्या का भारत को चुनना यह सुनिश्चित करता है कि वो चीन के पाले में ना जाए। यह भारत की विदेश नीति की एक बहुत बड़ी डिप्लोमेटिक विक्ट्री है।
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